>आचार्य हरनारायण जी महाराज :उठो जागो अपनी समीक्षा करो और विश्व कल्याण के लिए ध्वजा के वाहक बनो।

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प्रति-वर्ष होने वाले विशाल आयोजन का रूप ले चुके श्रीमद् भागवत प्रचार परिषद की ओर से हरि अमृत कथा का अष्टम आयोजन शनिवार दिनांक १८ दिसंबर २०१० से शहर के हाइडिल कालोनी मैदान में प्रारंभ हुआ। पिछले वर्षों की भांति इस बार भी समय निकाल कर मैं इस कथा में जाता रहा हूँ । कथा के पहले दिन आचार्य हरनारायण जी महाराज ने कहा कि प्रभु को अर्पित करने के लिए भक्त के पास अपना कुछ है ही नहीं जो कुछ है सब उसे परमेश्वर का ही तो दिया हुआ है। ऐसे में भक्त वंदना करते हुए कहता है कि हे भगवन तेरा तुझको अर्पण कर उसकी शरण में चला जाता है।
प्रभु और भगवान के बीच आस्था का सेतु होता है। इसी के द्वारा जीव ब्रह्म की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि सच्ची श्रद्धा के लिए पूजा दिखावटी नहीं होनी चाहिए। इसके लिए पवित्र मन हो छल कपट न हो नहीं तो आपके द्वारा की गयी पूजा व्यर्थ समझो। भगवत कथा का श्रवण करना ही सबसे बड़ा पुण्य कर्म है।

प्रभु की शरण तक पहुंचने के लिए भक्तों को आस्था के सेतु से होकर ही गुजरना होता है। भक्त के पास अपना ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वह प्रभु के चरण कमलों में अर्पित कर सके। उन्होंने कहा कि भक्त वह है, जो समस्त प्राणियों का हितैषी है, जिसके मन में कभी यह भाव नहीं आता कि यह मेरा और तेरा है।
इसी प्रकार जो प्रत्येक प्राणी को सम्मान की दृष्टि से देखता है। किसी को छोटा या बड़ा नहीं समझता, सभी में ईश्वर के प्रकाश का अनुभव करता है, जो किसी से घृणा नहीं करता, ज्ञानी और शांतचित्त है, वही श्रेष्ठ भक्त है। जो मन, वाणी और अपने क्रियाकलापों द्वारा दूसरों को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुंचाता, जिसमें संग्रह का स्वभाव नहीं होता, जो सच्ची बात ग्रहण करने के लिए सदा तैयार रहता है, जिसकी बुद्धि सात्विक गुणों से युक्त है, वह सबसे उत्तम भक्त है।

जो माता-पिता की सेवा करता है, देवताओं की पूजा में लीन रहता है, अपने गुरुजनों को आदर देता है तथा असहाय, निर्धन और वृद्ध लोगों की सहायता करता है, वही सच्चा भक्त है। ज्ञानियों, संन्यासियों और सेवाभावियों की सेवा करता है और उन्हें आदर देता है, शत्रु और मित्र में समभाव रखता है, सर्वत्र गुणों को ग्रहण करता है, कभी भी अच्छे व्यवहार या किसी शुभ कार्य की न तो आलोचना करता है और न ही उसमें कोई बाधा उत्पन्न करता है, वह सर्वोत्तम भक्त है। सद्गुणी होना जिस व्यक्ति की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, जो इस लोक में विनम्रता के साथ सेवा कार्य करता है, जो जीवों पर दया करता है और उत्तम कार्यों में सहयोगी बनता है, वह असली भक्त है।
भागवत कथा के पहले दिन आचार्य ने प्रभु व भक्त के बीच कैसे संपर्क बनता है विस्तृत रूप से कथा के माध्यम से बताया। कथा के पहले दिन ही भक्तों की काफी भीड़ रही। 
 
भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार दिनांक १९ दिसंबर २०१० को आचार्य ने भक्तों को विस्तृत रूप से कथा के माध्यम से बताया कि पहले अपने आपको देखो फिर कोई कदम उठाओ। दूसरे की ओर देखने से पहले अपने गिरहबान में झांक कर देखो। अपने अवगुण दूर करने के बाद ही दूसरे को नसीहत दो। अपने सुंदर आचरण से सामने वाले का दिल जीत लो।
आचार्य हरनारायण महाराज ने कहा कि हमारी मातृभूमि का अनुकरणीय इतिहास है। हमारे पूर्वजों ने अपने वचनों की रक्षा के लिए प्राणों तक का न्योछावर कर दिया है। आज जमाना बदल रहा है कथनी और करनी में अंतर आने लगा है।
मनुष्य को चाहिए कि वह स्वाध्याय में लगा रहे जिससे उसके चित्त में परिवर्तन आएगा। अध्ययन के बाद फिर स्वंय के आचरण की समीक्षा करें। इसके बाद आपके मन में सदगुण अवगुण स्पष्ट रुप से दिखने लगेंगे। आपका मार्ग स्वयं ही प्रशस्त होता जाएगा।जिनके जीवन में धर्म का प्रभाव है उनके जीवन में सारे सदगुण आ जाते हैं, उनका जीवन ऊँचा उठ जाता है, दूसरों के लिए उदाहरणस्वरुप बन जाता है ।

आप भी धर्म के अनुकूल आचरण करके अपना जीवन ऊँचा उठा सकते हो । फिर आपका जीवन भी दूसरों के लिए आदर्श बन जायेगा, जिससे प्रेरणा लेकर दूसरे भी अपना जीवन स्तर ऊँचा उठाने को उत्सुक हो जायेंगे । उठो जागो अपनी समीक्षा करो और विश्व कल्याण के लिए ध्वजा के वाहक बनो।

>फतेहपुर:शुद्घ मन और सात्विक विचारों को धारण करते हुये इस संसार में आचरण की पवित्रता से सब कुछ पाया जा सकता है….

>कल शाम को अचानक घुमते घुमते हाइडिल कालोनी में गया तो वहां चल रही भागवत कथा में बैठ गया ….लौट कर सोचा कि क्यों ना आपको भी कुछ अंश प्रषित कर दिए जाएँ?

शुद्घ मन और सात्विक विचारों को धारण करते हुये इस संसार में आचरण की पवित्रता से सब कुछ पाया जा सकता है। शिष्टाचार हमारी संस्कृति का अंग है और महापुरुषों द्घारा प्रस्तुत की गई जीवनशैली से हमारा भी मार्ग अवलोकित होता रहता है।
श्रीमद् भागवत प्रचार परिषद् के तत्वावधान में फतेहपुर के हाइडिल कालोनी में कथामंडपम की भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक श्रीहरनारायण जी ने कृष्ण रुक्मिणी प्रसंग के माध्यम से भक्तों को भक्तिभाव की गंगा में नहलाया।
आचार्य हरनारायण जी के अनुसार  हमारी भारतीय संस्कृति में शिष्टाचार परंपरा का अंग है। साधु संतो ने जो परंपरायें विकसित है वैसी परंपरा विश्व में कहीं नहीं मिलती है। ऋषि-मुनियों की प्रेरणास्पद जीवनशैली का पालन और अनुसरण करके कोई भी सात्विक और सरल जीवन जी कर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

संत ने कहा कि आप जहां भी रहे बस भक्ति भाव से प्रभु स्मरण करते रहे। तीर्थयात्रा में जायें तो मन में सात्विक भाव व विचार रखें। विश्वास रखें कि जिस भी प्रभु मूर्ति का स्मरण करेंगे वह मूर्ति आपके मन-मंदिर में आ बैठेगी। मन की मलीनता मानव को सदैव ही सुअवसर से वंचित करती है। स्वच्छ मन ही स्वच्छ कर्मो का संबल बनता है। चिंतन, मनन और आचरण ही व्यक्ति को प्रभु प्रेम का पात्र बनाते है।

मैं तो मनन कर रहा हूँ और आप….?

आज अमृत कथा का अन्तिम दिन !!

श्रीमदभागवत अमृत कथा में आचार्य हरनारायण जी ने कहा कि आतंक अत्याचारों में हो रही वृद्धि से आम जनमानस मानसिक पीड़ा में है। उन्होंने कहा कि ऐसी कराह जब एक साथ उठती है तभी धरा में परमात्मा का अवतार होता है।

हाय्डिल कालोनी में चल रही भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए आचार्य जी ने कहा कि जब-जब धर्म की वर्जनायें शिथिल हो जाती हैं, आतंक व अत्याचार में वृद्धि हो जाती है। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण मानवता के प्रतिनिधि के रूप में गुरु विश्वामित्र अयोध्या जाकर प्राणों से प्रिय राम को माता-पिता की गोद से जन कल्याण के लिये प्राप्त करते हैं और उन्हीं की मदद से राक्षसों का संहार करवाते हैं। इसके माध्यम से वह विश्व को यह संदेश देते हैं कि अभय रहो, धैर्य धारण करो राम अवतार हो चुका है। विश्व के मित्र जो हों वह आज भी मानवता को आश्वस्त करने का कार्य करते हैं। अखिल विश्व के मित्र को ही विश्वामित्र की संज्ञा प्राप्त होती है। आज भी कोई व्यक्ति विश्व मित्र बन सकता है इसके लिये उन्हें सतपथ पर चलकर विश्व कल्याण में सहयोगी भाव से काम करना होगा। उन्होंने कहा कि यह जग सुन्दर से सुन्दरतम हो जायेगा। महान आत्मायें क्रोध भी सृजन करती हैं। आम मनुष्य क्रोध में विध्वंस करता है यही महान और साधारण में अंतर है। उन्होंने कहा कि अपने से श्रेष्ठ और बुजुर्गो की बात मानकर जो कार्य किया जाता है वह कल्याणकारी होता है। राजा दशरथ ने अपने से श्रेष्ठों की बात मानकर ही भगवान राम को गुरु विश्वामित्र के साथ भेजा। उन्होंने कहा कि पृथ्वी में यदि कोई भी साक्षात देवता है तो वह है माता, पिता और गुरु। इन तीनों से अच्छी सीख ही मिलती है और यह अपने बच्चे व शिशु को अपने से भी अधिक ऊंचाइयों पर देखकर खुश होते हैं।

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