>फतेहपुर महोत्सव का काउंट डाउन शुरू हौ गया है……..कवि सम्मलेन और मुशायरे के लिए न्योते गए शायरों के नाम फाइनल

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फतेहपुर महौत्सव का काउंट डाउन शुरू हो  गया है। २८ जनवरी से शुरू होने  वाले फतेहपुर महोत्सव  में पांच हजार कुर्सियां दर्शकों  के लिए लगेंगी। मुख्य मैदान में प्रवेश के लिए तीन अलग-अलग द्वार खुलेंगे। वीआईपी प्रवेश आईटीआई के सबसे अंतिम सीसी मार्ग से हौगा जबकि आम लोगों  को  प्रवेश के लिए मध्य द्वार रहेगा। आईटीआई के प्रथम द्वार से भी लोगों  को  प्रवेश मिलेगा जिससे सीधे स्टाल की ओर लोग  जा सकेंगे।

प्रमोद तिवारी
मुन्नवर राणा
इधर पता चला है कि ‘फतेहपुर महोत्सव’ में आयोजित होने वाले कवि सम्मलेन के आयोजन के लिए न्योते जाने वाले कवियों के नाम फाइनल हो गये। 30 जनवरी को आईटीआई परिसर में देश के जाने माने कवियों का संगम होगा। महफिल को खास बनाने के लिए कवियों को आमन्त्रण भेजा जा चुका है। 30 जनवरी को महोत्सव में हास्य व्यंग्य व सांस्कृतिक रंगों के बीच कवियों का भी संगम होगा।
आने वाले कवियों में कोलकाता से मुनव्वर राणा, राजस्थान से अनामिका अंबर, सबीना अदीब, संदीप शर्मा, राजेन्द्र पंडित, अशोक साहिल, कमलेश शर्मा, सहारनपुर के नवाज देव बंदी, वाराणसी से अनिल चौबे, अशोक पंडित तथा कानपु के प्रमोद तिवारी आदि भी  हैं। कवि सम्मलेन के मंच पर संचालन का भार संभालेंगे इमरान प्रतापगढ़ी।
इधर शनिवार की सुबह से मैदान में बल्लियां गाड़ने  का काम भी शुरू हो  गया है। सफाई कर्मियौं की पूरी फ़ौज  मैदान में उतारी गई है। मुख्य मैदान में उगी हुई घास हटाई जा रही है तो  आईटीआई के मुख्य भवन के सामने की झाड़-झंखाड़ साफ करने के बाद अब उसमें मिट्टी और ईंटों  का मलबा डालकर मैदान बराबर करने का काम शुरू है। मलबा एवं कूड़ा-कचरा मैदान में बराबर करने के बाद पानी के छिड़काव सहित रौलर चलाया जा रहा है। स्टाल लगने के लिए टीन एवं बल्लियां भी आने लगी हैं । महोत्सव  में आने वाले लोगों  के वाहनों  का स्टैंड राजकीय बालिका इंटर कालेज में बनाया गया है। 

>फतेहपुर : आमों की बौर देख सरसों का हर खेत संत होता है।।

>फतेहपुर के बिन्दकी कस्बे में गुरुवार को नगर के महरहा रोड  पर बसंत पंचमी के अवसर पर एक कवि गोष्ठी हुयी। गोष्ठी में कवियों ने ऋतुराज के आगमन पर काव्य की ऐसी रसधार बहाई, जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये।

कवि गोष्ठी की शुरुआत करते हुये वरिष्ठ साहित्यकार वेद प्रकाश मिश्र ने बसंत की आहट की सुगबुगाहट को कुछ यूं व्यक्त किया-

शीत का जब अंत होता है, बागों में बसंत होता है। आमों की बौर देख सरसों का हर खेत संत होता है।।

कवि कासिम हुसैन ने अपने भाव कुछ इस तरीके से व्यक्त किये-

आयी बसंत बहार की है। फूलों की सुगंध खूब छायी है।

कवि मृत्युंजय पांडेय राजन ने मानव जीवन के लक्ष्य के बारे में अपनी रचना के जरिये समझाने का प्रयास किया- 

आना-जाना मौज मनाना है क्या लक्ष्य यही जीवन का? अर्थ शक्ति का संचय ही क्या पुरुषार्थ बना जीवन का!

कवि व साहित्यकार उमाशंकर ओमर ने कहा कि-  

जब मौसम कुछ गुनगुन होइगा, तो हम जाना आवा बसंत। जाचैं परखैं का निकर परेन कि कहां-कहां छावा बसंत।।

कवि सुनील पुरी ने ईश्वर से देश की खुशहाली मांगी-  

मानवता के मन मंदिर में, ज्ञान का दीप जला दो। करुणा निधान मेरे भगवान, मेरे भारत को स्वर्ग बना दो।

वयोवृद्ध कवि रहमत उल्ला नजमी ने पढ़ा कि  

नया बसंत नई कविता ले के आया हूं, अवस्था देखिये मेरी, समंदर पी के आया हूं।

कवि गोष्ठी की अध्यक्षता देवदत्त वैद्य देवेंद्र तथा संचालन वेदप्रकाश मिश्र ने किया। कार्यक्रम का आयोजन महेश्वरी पांडेय ने किया था।

उधर जनपद की अग्रणी साहित्यिक संस्था यायावर के तत्वावधान में बसंत पंचमी के अवसर पर मां सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना कर कार्यक्रम आईटीआई रोड स्थित डा. चंद्रकिशोर पांडेय के आवास में हुआ।
इस अवसर पर काव्य गोष्ठी की शुरुआत करते हुये डा. बालकृष्ण पांडेय ने अपनी गजलों के माध्यम से युग की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी-

दीपक में तो जान बहुत है, जलने का अरमान बहुत है। पांव जमाये पोध कहता, घर बाहर तूफान बहुत है।

मधुराक्षर संपादक कवि बृजेंद्र अग्निहोत्री ने पढ़ा-  

मां शारदे के सुत हैं कब तक सहेंगे, समाज के बदन की खाज। क्या देख सकेंगे हम समाज पर गिरती गाज।

वरिष्ठ कवि डा. चंद्रकुमार पांडेय ने प्रेम-सौंदर्य को मालिक उपमानों में प्रस्तुत किया-  

तुम सांध्य मलय की सुरभि मा व हो ऊषा की सुकुमार किरन, किम्बा सुरधनु की छाया हो या गोधूलि में क्षितिज मिलन।

कृष्ण कुमार त्रिवेदी ने सामाजिक विसंगतियों पर चोट करते हुये कहा-

मले तमाखू से गये, कटे सरौती बीच।

श्री चंद्रशेखर शुक्ल ने अपनी आध्यात्मिक रचना के द्वारा भारतीय संस्कृति का स्मरण किया-  

बाल वृद्ध युवा सभी अति पीर से पीड़ित हुये हैं। क्या नहीं मधुमास आया।

श्री आनंद स्वरूप श्रीवास्तव अनुरागी ने पढ़ा- 

हर्षित मन से मृदुल भावना, प्रेम भरा देती आशीष।

इस मौके पर यायावर के मंच से जनपद के वरिष्ठ कवि आनंद स्वरूप श्रीवास्तव अनुरागी की दो पुस्तकों का विमोचन डा. बालकृष्ण पांडेय ने किया।

>फतेहपुर : कसम है तुम्हे कोई दूरी न रखना। ये अपनी कहानी अधूरी न रखना

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अक्षय साहित्य कला केंद्र के 27वें कवि सम्मेलन में देश विख्यात कवि एवं रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से जहां वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था पर कटाक्ष किये वहीं प्रबुद्ध रचनाकारों ने संस्कृति की रक्षा का पाठ पढ़ाया।
शनिवार की रात्रि कवि सम्मेलन का शुभारंभ डा. ओमप्रकाश अवस्थी ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया जिसमें लखनऊ की व्याख्या मिश्रा ने कहा कि कसम है तुम्हे कोई दूरी न रखना। ये अपनी कहानी अधूरी न रखना। इसी कड़ी में राष्ट्रीय कवि वाहिद अली वाहिद ने वैसे तो चल रही है, हर शाम की दावत। लेकिन मैं चाहता हूं किसी काम की दावत। इसी कड़ी को बढ़ाते हुये एटा के लटूरी सिंह लट्ठ कवि ने आजादी की लड़ाई में जिसने जितना योगदान दिया। उसे देश से बदले में उतनी ही इज्जत मिली थी। मैनपुरी के बलराम श्रीवास्तव ने कहा कि मां अभिमान न होने पाये, शास्वत स्वर संगत देना। दूजा रंग न चढ़ पाये, मां ऐसी रंगत देना।। 
इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुये मवई धाम के स्वामी नित्यानंद ने कहा कि हम प्रकाश के संवाहक तम की, तमतमाहट झेली है। कितनी ही दीपावलियों के दिन हमने होली खेली है। आगे कवि तरुणेश सचान ने- एक भद्र खूंख्वार क्रांतिकारी हो गये। उसी वीर वर तूफानी का, हाल सुनो मेरे भइया, आदि अनेक कवियों ने सारी रात्रि लोगों को साहित्य के जरिये बांधे रखा।

जुगनू जगमग हंस रहे फैला यूं आतंक

शांति निकेतन मानव कल्याण समिति एवं यायावर संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आवास विकास स्थित सिद्धपीठ मां दुर्गाधाम पार्क में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें पधारे कवियों ने रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं का मनोरंजन किया।

बसंत पंचमी के मौके पर आयोजित कवि सम्मेलन में अनिल तिवारी निर्झर ने पढ़ा कि-

ठोस से आदमी जब तरल हो गया कीच में आदमी तब कमल हो गया।

केपी सिंह कछवाह कृष्ण ने पढ़ा कि-

डाल-डाल झूम रही यौवन आनंद से, पात-पात रहे डोल खुशी अब अनंत है, आ गया बसंत है।

डा. कृष्णपाल सिंह गौतम के उद्गार थे कि-

साथ मत करो काजल से कालिख लग जायेगी, अरे जुड़ो मत नीच से नीचता आ जायेगी।

श्रवण कुमार पांडेय पथिक बोले- फिर से लौट आयी है पटरी पर गाड़ी तो लोक गीतकार समीर शुक्ल ने पढ़ा-

ईश्वर अल्ला के नाम से जो गदर है खुल्लमखुल्ला ब्वालौ यहिका जिम्मेदार को? तुम या पंडित मुल्ला।

शैलेश गुप्त वीर ने पढ़ा कि-

सूरज भी मद्धिम हुआ फीका पड़ा मयंक। जुगनू जगमग हंस रहे फैला यूं आतंक।

वहीं ज्ञानेंद्र गौरव ने पढ़ा-

एक धरती बंटी दिल बंटे, हम बटे रोज मनहूस दिन आ गया पौ फटे, दर्द कम नहीं यह सायरी के लिये।

डा. मधुलिमा चौहान ने कहा- दर्द मिला लेकिन दर्दो से बदल गयी गीतों की सरगम। डा. बृजमोहन पांडेय विनीत ने पढ़ा-

निज मातृभूमि की पुकार सुन दौड़ पड़े, वीर शिवा जैसा स्वाभिमान हमें चाहिए।

आचार्य पंडित सत्यानंद शुक्ल ने संस्कृत रचना का वाचन किया- प्राचीन संस्कृते: स्याद् राष्ट्रे पुनर्विकासे। डा. रामलखन सिंह परिहार प्रांजल ने पढ़ा-सपनों की अर्थी को ढोते जैसा चाहा उसे जिया। जानकी प्रसाद श्रीवास्तव शास्वत ने पढ़ा-

गुबारों के समंदर में मचलता कारवां हूं मैं, जो कांटों को कुचल डाले ऐसा बागवां हूं मैं।

शिवशरण सिंह चौहान अंशुमाली ने पढ़ा-

बासंती परिधान पहनकर तुम मेरे घर आना, मैं पराग की कणिकाओं से कर दूंगा अभिनंदन।

इसी क्रम में धर्मचंद्र मिश्र कट्टर, विनोद कुमार विनोद, हरीबाबू सिंह राउत, सलीम अहमद शास्त्री, दागनियाजी, भइयाजी अवस्थी करुणाकर, चंद्रशेखर शुक्ल, आनंद स्वरूप श्रीवास्तव अनुरागी, अनूप शुक्ल, अवधेश कुमार द्विवेदी, डा. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ने अपनी रचनाओं को प्रस्तुत किया। कवि सम्मेलन का संचालन कवि शिवशरण बंधु ने किया।

मलवां में संपन्न हुई कवि-सम्मलेन की अगली कड़ी …

साहित्य समाज का दर्पण होता है। कुछ यही दर्शाते हुए मलवां के कवि सम्मेलन में साहित्यकारों ने वर्तमान परिवेश में आतंकवाद से निपटने के लिये जोश भरने का काम किया। रायबरेली के हास्य व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर मधुप श्रीवास्तव ने

हम उस देश के बेटे हैं दुश्मन को पछाड़ा करते हैं शेरों की क्या बात करें गीदड़ भी दहाड़ा करते हैं

पंक्तियों से खूब वाहवाही लूटी। उन्होंने पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए इन पंक्तियों से देशवासियों के अन्दर जोश भी भरा।

स्वर्गीय मोहनलाल गुप्त जयंती के अवसर पर कवि सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्य भूषण धनंजय अवस्थी ने मृदाल रचना की पक्ति के माध्यम से वीरता का आहवान किया।

भावों का अर्थ नयन कोर किया करते हैं, पांवों को गति नूतन लक्ष्य दिया करते हैं सदियों तक चलती है दुनिया जिन राहों में उनका निर्माण धीर, वीर किया करते हैं।

पंक्तियों के माध्यम से मनुष्य का जन्म लेकर कुछ करने का जज्बा भरा। लालगंज रायबरेली के अंजनी कुमार सिंह ने ग्रामीण जीवन को झलकाते हुए कहा कि

भीतर भरी है आग मगर होंठ क्यों सिये, उठता है इंकलाब नहीं, बोलो किसलिये।

इलाहाबाद के युवा कवि शैलेष गुप्त ने बदल गया है

आलम सारा बदल गये सब रंग, फीकी है मुस्कान यहां की लगी हुई है जंग।

कविता पढ़ी। खागा के अनिल तिवारी ने पग बढ़े तो बढ़े नवसृजन के लिये, हथगाम के शिवशरण बंधु ने

कंकर किसने फेंक दिया है पानी में, पानी का दिल कांप रहा है पानी में

पढ़कर सामाजिक व्यवस्था पर झकझोरा। आचार्य विष्णु शुक्ला ने फकीरों का इस दुनिया में कहीं घर नहीं होता कविता पढ़ी। युवा कवि समीर शुक्ल ने इक झगड़ा भवा गांव मइहां, जब भार जला सतुवाहिन का लोक भाषा की रचना से लोगों का मन मोहा। संयोजक नरेश गुप्त ने आत्म साधना से संभव है सेवा इस संसार की भक्ति रचना पढ़ी।

वरिष्ठ कवि शिवशरण सिंह अंशुमाली, तारकेश्वर बाजपेयी, डा।हरिप्रसाद शुक्ल अकिंचन, भइया जी अवस्थी, विनोद कुमार, श्रवण कुमार, संग्राम सिंह, गजराज गुप्त केहरि आदि ने विशिष्ट रचनायें प्रस्तुत कर स्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। कार्यक्रम में रामप्रसाद गुप्त, रामभूषण सिंह, उमाशंकर त्रिपाठी, स्वयंवर सिंह, कमल नाथ, कमलमणि त्रिपाठी, भगवंत सिंह, राधेश्याम हयारण आदि रहे।

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