फतेहपुर में इस बार तीन राष्ट्रीय दलों के अध्यक्ष अपनी किस्मत आजमा रहे

संसदीय क्षेत्र फतेहपुर में इस बार तीन राष्ट्रीय दलों के अध्यक्ष अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जनमोर्चा, अपना दल एवं इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अपना चुनाव प्रचार चरम सीमा पर पहुंचा चुके हैं और अपनी-अपनी ताकत का इजहार कर यह जताना चाहते हैं कि हमारे दलों में कितना दम है।

जनमोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री स्व. वीपी सिंह के पुत्र अजेय सिंह जो पिछले एक पखवारे से अपने पिता के कार्यो के नाम पर वोट मांग रहे हैं। उनको हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है। स्व. वीपी सिंह यहां से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं और यहां के मतदाताओं ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक में बैठाया। अजेय सिंह के अनुसार फतेहपुर हमारे पिता की कर्मभूमि रही है और उन्होंने यहां विकास का पहिया घुमाया। देश में आरक्षण व्यवस्था लागू करके पिछड़े वर्गो में मुस्कान भरी वहीं मुस्लिमों के बीच अच्छी तस्वीर पेश की। जिसका परिणाम आज अजेय सिंह को मिल रहा है। पिछड़े वर्ग के मतदाताओं व मुस्लिमों का समर्थन देखकर अजेय सिंह काफी गदगद हैं और उनको आशा है कि इस चुनाव में जरूर सफल होंगे।

संसदीय क्षेत्र में अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनेलाल पटेल भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। फूलपुर का चुनाव संपन्न होने के बाद उन्होंने पूरी ताकत इस संसदीय क्षेत्र में झोंक दी है। श्री पटेल का फतेहपुर के धाता, किशुनपुर, जहानाबाद, अमौली, देवमई आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव है। वर्ष 2002 में उनके दल का प्रत्याशी अशोक कैथल किशुनपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था, जिसे चौबीस हजार पांच सौ छियानवे मत प्राप्त हुये थे और वह तीसरे नंबर पर था। श्री पटेल समय-समय पर फतेहपुर में आकर यहां की समस्याओं से रुबरू होते हैं और आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। श्री पटेल का दावा है कि उन्हें इस चुनाव में उनकी नीतियों को सफल बनाने के लिये उन्हें मतदाता जीत अवश्य दिलायेंगे।

इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. उदित राज आईएएस जिन्होंने अपनी नौकरी ठुकराकर बसपा का विकल्प अपनी पार्टी को बताते हुये चुनाव मैदान में उतरे हैं। डा. राज के अनुसार इलाहाबाद व कानपुर के बीच बसे इस जनपद में विकास यहां शून्य है। बिहार से भी बदतर जिला है। ऐसी स्थिति में उन्होंने यहां चुनाव लड़ने का फैसला किया और यदि यहां के मतदाता चुनाव जिताकर संसद भेजेंगे तो वह यहां विकास की गंगा बहा देंगे। उन्होंने कहा कि बहुजन समाजवादी पार्टी में माफियाओं का राज है, मायावती जिनको अपना वोट बैंक समझती है, उन्हीं पर इन माफियाओं द्वारा कहर ढाया जा रहा है। बसपा के जुल्मों के खिलाफ वह चुनाव मैदान में हैं। इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को कई इलाकों में हाथों हाथ लिया जा रहा है। उनकी होने वाली सभाओं में भीड़ भी कम नहीं रहती। उनकी विचारधारा को लोग सुनते हैं।

इस संसदीय क्षेत्र में यह तीनो महारथी क्या गुल खिलायेंगे यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेगा।

परदेसियों की प्रयोगस्थली रहा फतेहपुर का संसदीय क्षेत्र

राजनैतिक दलों द्वारा अन्य जिलों के नेताओं को तरजीह देने के कारण फतेहपुर संसदीय सीट पर अधिकांश समय गैर जिलों के लोगों ने ही लोकसभा में यहां का प्रतिनिधित्व किया। इसका असर यह हुआ कि जिले के विकास पर कम ध्यान दिया गया। जिसकी वजह से फतेहपुर सुविधाओं के मामले में अन्य जनपदों से काफी पीछे चल रहा है।

यहां चौदह लोकसभाओं के लिए चुने गए कुल 11 सांसदों में 8 परदेशी रहे, स्थानीय तीन ही लोगों को संसद में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछडे़ इस जिले के लोगों में जागरूकता की कमी रही, जिससे उनको प्रमुख राजनैतिक दल प्रत्याशी बनाने से गुरेज करते रहे।गंगा यमुना के दोआबा क्षेत्र में स्थित फतेहपुर संसदीय क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद यहां पर कोई ऐसा नेता नहीं मिला, जिसने सांसद पद के लिए कांग्रेस में कभी गंभीर दावेदारी की हो। उस दरम्यान कांग्रेस का ही बोलबाला था। 1952 में इलाहाबाद के रहने वाले शिवदत्त उपाध्याय और 1957 में भी इसी जिले के रहने वाले अंसार हरवानी ने प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1962 के चुनाव में देशी परदेशी का मुद्दा गरमाया तो जिले के रहने वाले अधिवक्ता गौरीशंकर कक्कड़ निर्दलीय सांसद चुने गए। इसके बाद 1967 और 71 में फिर से कांग्रेस के टिकट से प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले संतबख्श सिंह सांसद रहे।

देश में इमरजेंसी लगाने पर कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई तो 1977 में जनता पार्टी के टिकट से इलाहाबाद के रहने वाले वकील बशीर अहमद सांसद चुन लिए गए। इनकी मौत होने के कारण मध्यवधि चुनाव हुआ, जिसमें स्थानीय को जनता पार्टी ने तवज्जो देकर 1978 में चुनाव में उतारा तो लियाकत हुसैन सांसद बन गए। इसके बाद 1980 और 84 में बनारस के रहने वाले स्व। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्र हरीकृष्ण शास्त्री ने कब्जा बरकरार रखा। इनके कब्जे से 1989 में राजा मांडा वीपी सिंह ने सीट छीनी और 1991 के चुनाव में भी कब्जा बरकरार रखा।

1996 में बांदा जिले के रहने वाले विशंभर के कब्जे में यह सीट चली गई। 1998 और 99 के चुनाव में जिले के रहने वाले डा. डाक्टर अशोक पटेल सांसद चुने गए। इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में बांदा जिले के ही रहने वाले बसपा के महेंद्र निषाद ने कब्जा कर लिया, जो अभी तक बरकरार है। खास बात तो यह है कि भाजपा को छोड़कर सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के उम्मीदवार मूलरूप से गैर जिलों के हैं। यह बात दीगर है कि कुछ प्रत्याशियों ने आवासों का निर्माण करा अपने को मतदाता भी बना लिया है।

>संसदीय इतिहास में 78 के उप चुनाव की तस्वीर जब राष्ट्रकवि भी हो गये थे जिला बदर

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चार दिन तक जिले में टिककर छत्तीस जनसभायें कर चुनावी माहौल का रुख मोड़ने में और कोई नहीं पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने वर्ष 1978 के उप चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी। संसदीय क्षेत्र के इतिहास में 78 के उप चुनाव की तस्वीर को कोई भूल नहीं सकता। इस चुनाव में जिले में पूरे देश की राजनीति केन्द्रित हो गयी थी। इन्दिरा गांधी की जनसभाओं को मात देने के लिये विपक्ष से सुषमा स्वराज लगी हुई थीं। स्थिति यह थी कि कांग्रेस के राष्ट्रीय व प्रान्तीय नेता बूथों में बस्ते लगाकर बैठे थे। एक साल बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध जनाक्रोश की ज्वाला तो भड़क रही थी। कुछ तो ठंडी हुई, लेकिन एकजुट विपक्ष के सामने सीट कांग्रेस की झोली में जाते-जाते रुक गयी।

जनता पार्टी के सांसद वशीर अहमद की आकस्मिक मौत हो जाने के कारण संसदीय क्षेत्र में वर्ष 1978 में उपचुनाव घोषित किया गया। इस चुनाव में कांग्रेस ने वरिष्ठ कांग्रेसी पूर्व विधायक प्रेमदत्त तिवारी को चुनाव मैदान में उतारा। पार्टी पहले बाहरी को ही प्रत्याशी बनाना चाहती थी, लेकिन दोनों गुटों के कांग्रेसियों की मांग पर जिले के आधा दर्जन दावेदारों में श्री तिवारी के नाम पर इन्दिरा गांधी ने मोहर लगा दी। लोकदल जिसे सभी विपक्षियों का समर्थन प्राप्त था से लियाकत हुसेन को प्रत्याशी बनाया गया।

दिलचस्प पहलू यह था कि चुनाव में कांग्रेस हो या विपक्ष देश व प्रदेश के सभी नेताओं की निगाहें इस सीट पर लगी हुई थीं। कांग्रेस से पूर्व गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित, मोहसिना किदवई, नारायण दत्त तिवारी, राजेन्द्र कुमारी बाजपेयी सहित कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवराज अर्ग कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकांत बरुआ सहित आधा सैकड़ा से अधिक राष्ट्रीय व प्रान्तीय नेता डेरा डाले रहे। कांग्रेस की मुखिया स्व.इन्दिरा गांधी चार दिन तक जिले में टिककर छत्तीय जनसभायें कीं। खखरेरू की जनसभा में विपक्षियों की लामबंदी से पूर्व प्रधानमंत्री की गाड़ी पर पथराव हुआ। नारेबाजी के साथ कई जगह विरोध के स्वर मुखर हुए इसके बाद भी पूर्व प्रधानमंत्री ने जगह-जगह जनसभायें कर बदलाव का विगुल फूंक दिया। प्रदेश की वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री राजेन्द्र कुमारी बाजपेयी, प्रेमवती तिवारी, स्वरूपरानी बख्शी, मोहसिना किदवई के साथ जिले की महिला टीम का नेतृत्व श्रीमती शारदा मिश्रा, मालती श्रीवास्तव आदि ने किया। जनता पार्टी की सत्ता की हनक कम नहीं रही। जानकार लोगों ने बताया कि उस समय सत्ता की हनक के चलते पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को टिकने के लिये डाकबंगले तक उपलब्ध नहीं हो पाये थे। पार्टी ने सभी बंगलों को अधिगृहीत कर लिया था। अंतत: इन्दिरा गांधी को नगर पालिका के बिना हस्तांतरित हुए नवनिर्मित डाक बंगले में टिकाया गया। राष्ट्रीय व प्रान्तीय नेता गली-कूचों में न केवल घूमे बल्कि मतदान के दिन बस्ते लगाकर भी बैठे।

ऐसे में जब कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी हो तो सत्ता की हनक रखने वाला विपक्ष क्यों पीछे रहे। लोकदल से लियाकत हुसेन को प्रत्याशी बनाया गया था। जनसंघ सहित अन्य विपक्षियों का समर्थन हासिल किये प्रत्याशी को जिताने के लिये अटल बिहारी बाजपेयी, जार्ज फर्नाडीज, राजनारायण, चौ.चरण सिंह, कांग्रेस से अलग हुए एचएन बहुगुणा जैसे कई दिग्गज नेताओं ने जगह-जगह जनसभायें कीं। सुषमा स्वराज तो कई दिनों तक जिले में डेरा डाले रहीं। इन्दिरा गांधी की जनसभायें जहां पर होती थीं उसी के इर्द-गिर्द श्रीमती स्वराज दहाड़कर लियाकत के लिये वोट मांग रही थीं। कांग्रेसियों का कहना है कि शासन और प्रशासन सत्ता पक्ष की हनक पर काम कर रहा था। चूंकि 1977 के चुनाव में आपातकाल, परिवार नियोजन जैसे मुद्दों का घाव जनता में भरा नहीं था इसलिए पार्टी की झोली में सीट तो नहीं आ पायी, लेकिन दिग्गज नेताओं के प्रयास से एक साल में ही वोट बैंक दूना पहुंच गया।

सतहत्तर के चुनाव में कांग्रेस को उखाड़ फेंकने का जो जुनून था वह उपचुनाव में नहीं देखा गया तभी तो अड़तालीस फीसदी की जगह उप चुनाव में मतदान चालीस फीसदी में ही सिमट गया। छ: लाख छियालीस हजार मतदाताओं में से दो लाख उन्यासी हजार मतदाताओं ने वोट डाले। लोकदल प्रत्याशी लियाकत हुसेन एक लाख तीस हजार छ: सौ इक्कीस मत पाकर सीट को बरकरार रखी। कांग्रेस प्रत्याशी प्रेमदत्त तिवारी को एक लाख पांच हजार वोट मिले। इस चुनाव में डमी उम्मीदवारों की भी खासी भीड़ थी। प्रियदर्शन यादव बारह हजार वोट समेटकर कांग्रेस को पराजित करने में विपक्ष का साथ दिया। इसी प्रकार अनुसूचित जाति के कई प्रत्याशियों ने पांच हजार से अधिक मत बटोरे।

राष्ट्रकवि भी हो गये थे जिला बदर

उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी प्रेमदत्त तिवारी अपने संस्मरण बताते हुए कहा कि उस समय न तो चुनाव आयोग का डंडा था। सत्ता की हनक काम कर रही थी। उस समय कांग्रेस का वोट बैंक कहे जाने वाले ब्राह्मणों को जिला बदर की सूची में डालकर मतदान से बाहर कर दिया गया था। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी, पूर्व ब्लाक प्रमुख सोमदत्त द्विवेदी जो उनके चचेरे भाई थे सहित कई रिश्तेदारों व करीबियों को जिला बदर की सूची में डाला गया था। उस समय इन्दिरा गांधी भी यह कार्यवाही देखकर दंग रह गयीं और उन्होंने यह कहा कि इस पर पिटीशन कर दें

(दैनिक जागरण से साभार)

फतेहपुर :जिले के मतदाताओं ने किसी को निराश नहीं किया

फतेहपुर के इस ब्लॉग से जुड़े हुए लोगों …… विशेषकर बाहर रह रहे छात्रों और नौकरी कर रहे लोगों को राजनीतिक चुनावी इतहास से परिचित कराने के लिए दैनिक जागरण का यह लेख साभार प्रस्तुत है

जिले के मतदाताओं में यह खासियत रही कि किसी को निराश नहीं किया है। हर दल को बुलंदियों तक ले गया है और फिर उसे किनारे कर दिया है। नेतृत्व की बागडोर हमेशा दलीय प्रत्याशियों को ही सौंपी है। वर्ष 1962 इसका अपवाद है जब गौरीशंकर कक्कड़ कांग्रेस के प्रत्याशी को पराजित कर संसद पहुंचे। वर्ष 2009 का आइना बदला हुआ होगा। इस बार परिसीमन से संसदीय क्षेत्र का जहां भूगोल बदला हुआ है वहीं मतदाताओं की संख्या भी तीन लाख से अधिक बढ़ गयी है। नये भूगोल पर इतिहास बनाने के लिये यूं तो हर दल हाथ-पैर मार रहे हैं। देखना यह है कि मतदाता इस बार अपनी पसंदगी का रुख किस ओर मोड़ रहा है।

पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के लिये चुनाव की तिथियां घोषित होने के साथ ही राजनीतिक दलों की सरगर्मी तेज हो गयी है। संसदीय क्षेत्र के लिये तीसरे चरण में यानी 30 अप्रैल को मतदान होगा। 2 अप्रैल से अधिसूचना जारी होने के साथ नामांकन 9 अप्रैल तक चलेगा। इसके बाद नामांकन पत्रों की जांच और तेरह अप्रैल को नामवापसी होगी। वर्ष 1952 से संसदीय क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालें तो जिले के मतदाताओं ने हर दल को तवज्जो दी है। लगातार संघर्ष करने वाले किसी भी दल को मायूस नहीं किया है। यह जरूर है कि अपनी पसंदगी को बुलंदियों तक पहुंचाने के बाद मतदाताओं ने रुख मोड़ा और चुनाव परिणाम को पलट दिया। पंद्रह बार हुए चुनाव में सर्वाधिक जीत कांग्रेस की झोली में छ: बार गयी। वर्ष 1952, 57, 67, 71, 80 व 84 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस को संसदीय क्षेत्र के नेतृत्व की बागडोर सौंपी। भाजपा को वर्ष 1998 व 99 के चुनाव में जीत दिलायी। बसपा को भी जिले के मतदाताओं ने दो बार संसदीय क्षेत्र के नेतृत्व का मौका दे दिया है। वर्ष 1996 में विशम्भर निषाद बसपा से चुनाव जीते थे। यही प्रत्याशी वर्ष 1998 में सपा से चुनाव मैदान में उतरे थे। मतदाताओं ने नकार दिया। वर्ष 2004 में बहुजन समाज पार्टी से महेन्द्र निषाद को जीत दिलायी। इसके अलावा जनता पार्टी को दो बार, जिले की ही संसदीय क्षेत्र से जीतकर पहुंचे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देश के प्रधानमंत्री की बागडोर संभाली थी। जिले की जनता ने वर्ष 1989 में 49 फीसदी मत वीपी सिंह को देकर ऐतिहासिक जीत हासिल करायी। हालांकि दोबारा 1991 में जब वह फिर चुनाव मैदान में उतरे तो जीत तो हासिल कर ली, लेकिन वोट प्रतिशत सात फीसदी कम हो गया।

वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव पिछले सभी चुनावों से अलग होगा। एक तो परिसीमन के बाद जो भौगोलिक स्थिति सामने आयी है उसमें बांदा जनपद की तिंदवारी विधानसभा का नाता संसदीय क्षेत्र से समाप्त हो गया है। जिले की दो विधानसभायें जो घाटमपुर व चायल संसदीय क्षेत्र में शामिल थीं वह अब संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आ गयी हैं। ऐसे में मतदाताओं की संख्या जहां बढ़कर साढ़े पंद्रह लाख पहुंच गयी है वहीं जातीय समीकरण भी पहले से भिन्न हो गये हैं। पांच की जगह छ: विधानसभाओं के बड़े क्षेत्रफल में चुनाव प्रचार में भी प्रत्याशियों की कवायद बढ़ गयी है। उधर अभी तक सुरक्षित सीटों के अंतर्गत रहे खागा व जहानाबाद के मतदाता पहली बार सामान्य प्रत्याशियों से जुड़ रहे हैं ऐसे में इन दोनों विधानसभाओं की सरगर्मी कुछ ऐसी होगी जो संसदीय क्षेत्र के परिणाम को उलट-पलट कर सकती है।

फतेहपुर:चुनाव की तिथियां घोषित होने के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी तेज

लोकसभा 2009 के चुनाव की तिथियां घोषित होने के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गयी है। मतदाताओं की नब्ज टटोलने के साथ प्रत्याशी जातीय समीकरणों की गणित में उलझे हुए हैं। नये परिसीमन पर पहली बार दो विधानसभा क्षेत्रों की जनता से प्रत्याशियों को वोट मांगने पड़ेंगे। चुनावी सरगर्मी में मतदाता भी शामिल हो गये हैं और वह अपनी पसंदगी जताते हुए मैदान में आये प्रत्याशियों के साथ दलों पर समीक्षात्मक प्रतिक्रिया कर रहे हैं।

भारत निर्वाचन आयोग ने सोमवार को पंद्रहवीं लोकसभा की चुनाव तिथिया घोषित कर दी हैं जिसमें प्रदेश का चुनाव पांच चरणों में होगा। चुनाव तिथि तय होने के साथ ही चुनावी दुंदुभी बज गयी है। राजनीतिक दलों सहित मतदाताओं के बीच भी सरगर्मी तेज हो गयी है। फतेहपुर संसदीय क्षेत्र के लिये अभी तक बहुजन समाज पार्टी ने अपने पुराने सांसद महेन्द्र निषाद को, भाजपा ने सदर विधायक राधेश्याम गुप्त को लोकसभा का प्रत्याशी घोषित किया है। समाजवादी पार्टी से राकेश सचान, अपना दल से सोनेलाल पटेल संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे इसके लिये प्रत्याशियों ने यूं तो पहले से ही प्रचार शुरू कर दिया था, लेकिन तिथि तय हो जाने के बाद सरगर्मी और तेज हो गयी है। प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ बैठक कर कल से ही चुनाव प्रचार रंगत के साथ शुरू करने की रणनीति देररात तक बनाते रहे। कार्यकर्ताओं के हुजूम को किस तरह से जोड़ा जाये इसके लिये प्रत्याशियों ने पार्टी संगठन के पदाधिकारियों को लगाया है। विधानसभा स्तर पर चुनाव कार्यालय खोलकर जिम्मेदारी देने के लिये संगठन सूची तैयार करने में लग गये हैं। संसदीय क्षेत्र के घोषित प्रत्याशियों ने आयोग द्वारा तय की गयी तिथियों पर समर्थन जताते हुए कहा कि पांच चरणों में प्रदेश का चुनाव जिन तिथियों पर कराया जा रहा है सही है।

मतदाताओं को झकझोर कर जीत हासिल करने के लिये चुनावी मुद्दा क्या बनाया जाये इस पर प्रत्याशी उलझे रहे। बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों के साथ जिलास्तर के चुनावी मुद्दा को प्रत्याशी अधिक कारगर मान रहे हैं। भाजपा, सपा तो वर्तमान सांसद की निष्क्रियता व विकास कार्य में अनदेखी को ही मुख्य मुद्दा बना रहे हैं जबकि वर्तमान सांसद प्रदेश सरकार की विकास योजनाओं व गरीबों के लिये लागू की गयी योजनाओं को मुद्दों में शामिल किये हुए हैं।

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