स्वतंत्रता के आंदोलन में अपनी कविताओं के माध्यम से क्रांतिकारियों में जोश भरने वाले राष्ट्रकवि पंडित सोहन लाल द्विवेदी की यादगार में नगर के तत्कालीन राज्यमंत्री राजेंद्र सिंह पटेल ने पुस्तकालय एवं वाचनालय का निर्माण कराया था। किंतु दुर्भाग्य भवन में साहित्य प्रेमियों के लिए यहां साहित्य नहीं है। ऐसे में यहां के साहित्य प्रेमियों को पीड़ा है। नगर के वरिष्ठ साहित्यकार बेदप्रकाश मिश्रा का कहना है कि साहित्य मुहैय्या कराने के लिए कई बार बैठकें हुई। किंतु बैठकें औचित्य हीन रहीं। परिणाम स्वरूप साहित्य क्रय नहीं किया जा सका है। जबकि नगर पालिका के पास इस मद की धनराशि भी है। इस पुस्तकालय समिति के सदस्य लोकनाथ पांडेय का कहना है कि चुनाव के बाद साहित्य हेतु बैठक पुन: होगी। जिसमें साहित्य को सूचीबद्ध कर खरीददारी करायी जायेगी।
नाम जब्बार हुसेन। उम्र साठ बरस। ख्वाहिश हाईस्कूल पास होने की..। यह किसी की जन्म कुडंली नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की प्रोफाइल है। जो हाईस्कूल पास करने के लिए 40 बार परीक्षा दे चुका है। हाईस्कूल परीक्षा पास करने के अपने जूनून के चलते कस्बे का यह बुजुर्ग इकतालिसवीं बार परीक्षा में बैठने के लिए पूरी शिद्दत के साथ तैयारियों में जुटा है।
देखना यह है अपने इस जज्बे के चलते लोगों के लिए कौतूहल बन चुका यह पप्पू आखिर कब पास होगा।तकरीबन चार दशक पहले जब्बार मियां जब पहली बार दसवीं की परीक्षा में बैठे थे। उस वक्त उनकी उम्र सोलह बरस थी। तब परीक्षाओं के कायदे कानून बडे़ सख्त हुआ करते थे। शायद इस वजह से वह परीक्षा पास नहीं कर पाए। उसके बाद परीक्षाओं में बैठने का दौर लगातार जारी रहा। चालीस बार परीक्षा में बैठने के बावजूद सफलता उनके हाथ नहीं लगी। खोटी किस्मत इस विद्यार्थी के साथ हर बार दगा दे गई। आज जब्बार 60 साल के हैं। लेकिन पढ़ाई के प्रति उनका जज्बा उसी तरह बरकरार है। यही वजह है कि कस्बे का यह बुजुर्ग विद्यार्थी किसी नए परीक्षार्थी की भांति 41वीं बार दसवीं की परीक्षा में बैठने के लिए तैयारियों में पूरी शिद्दत से जुटा है। सफलता के लिए वह न सिर्फ ट्यूशन पढ़ रहे हैं। बल्कि प्रधानाचार्य की अनुमति से नेहरू इंटर कालेज , बिन्दकी , फतेहपुर में कक्षाएं लेने भी जाते हैं। उन्होंने नेहरू कालेज से ही हाईस्कूल का फार्म भरा है। अपने इस जज्बे के बारे में जब्बार कहते हैं कि शिक्षा से बड़ा कोई धन नहीं है। घरेलू स्थिति सही न होने की वजह से वह पढ़ाई में पूरा समय नहीं दे पाए। उन्होंने बताया कि यदि इस बार सफलता हाथ लगती है तो वह आगे की कक्षा में दाखिला लेंगे, अन्यथा पुन:दसवीं की परीक्षा देंगे।
तहसील के पास जूते-चप्पल की छोटी सी दुकान लगाकर गुजारा करने वाले जब्बार का परिवार पढ़ाई की वजह से ही टूट गया। सन 1960 में उसकी शादी कल्यानपुर थाना क्षेत्र के गुगौली की ननकी के साथ हुई। जो यह चाहती है कि जब्बार पढ़ाई छोड़कर रोजी कमाने में लग जाएं किन्तु ऐसा नहीं हुआ। इसे लेकर उसका पत्नी के साथ झगड़ा हुआ और उसने दूसरी शादी कर ली। तब से वह अकेले जीवन बिता रहे हैं। उन्होंने बताया कि रिश्ते नाते सब क्षणिक हैं।
बावनी इमली कहा जाने लगा। चार फरवरी 1858 को ठा. जोधा सिंह अटैया पर ब्रिगेडियर करथ्यू ने असफल आक्रमण किया। साहसी जोधा सिंह अटैया को सरकारी कार्यालय लूटने एवं जलाये जाने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें डकैत घोषित कर दिया। जोधा सिंह ने 27अक्टूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक दरोगा व एक अंग्रेज सिपाही को घेरकरमार डाला था। सात दिसंबर 1857 को गंगापार रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला करएक अंग्रेज परस्त को भी मार डाला। इसी क्रांतिकारी गुट ने 9 दिसंबर को जहानाबाद में गदर काटी और छापा मारकर ढंग से तहसीलदार को बंदी बना लिया।जोधा सिंह ने दरियाव सिंह और शिवदयाल सिंह के साथ गोरिल्ला युद्ध कीशुरुआत की थी। जोधा सिंह को 28 अप्रैल 1858 को अपने इक्यावन साथियों के साथ लौट रहे थे तभी मुखबिर की सूचना पर कर्नल क्रिस्टाइल की सेना ने उन्हें सभी साथियों सहित बंदी बना लिया और सबको फांसी दे दी गयी। बर्बरता की चरम सीमा यह रही कि शवों को पेड़ से उतारा भी नहीं गया। कई दिनों तक यह शव इसी पेड़ पर झूलते रहे। चार जून की रात अपने सशस्त्र साथियों के साथ महराज सिंह बावनी इमली आये और शवों को उतारकर शिवराजपुर में इन नरकंकालोंकी अंत्येष्टि की।
बावनी इमली कहा जाने लगा। चार फरवरी 1858 को ठा. जोधा सिंह अटैया पर ब्रिगेडियर करथ्यू ने असफल आक्रमण किया। साहसी जोधा सिंह अटैया को सरकारी कार्यालय लूटने एवं जलाये जाने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें डकैत घोषित कर दिया। जोधा सिंह ने 27अक्टूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक दरोगा व एक अंग्रेज सिपाही को घेरकरमार डाला था। सात दिसंबर 1857 को गंगापार रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला करएक अंग्रेज परस्त को भी मार डाला। इसी क्रांतिकारी गुट ने 9 दिसंबर को जहानाबाद में गदर काटी और छापा मारकर ढंग से तहसीलदार को बंदी बना लिया।जोधा सिंह ने दरियाव सिंह और शिवदयाल सिंह के साथ गोरिल्ला युद्ध कीशुरुआत की थी। जोधा सिंह को 28 अप्रैल 1858 को अपने इक्यावन साथियों के साथ लौट रहे थे तभी मुखबिर की सूचना पर कर्नल क्रिस्टाइल की सेना ने उन्हें सभी साथियों सहित बंदी बना लिया और सबको फांसी दे दी गयी। बर्बरता की चरम सीमा यह रही कि शवों को पेड़ से उतारा भी नहीं गया। कई दिनों तक यह शव इसी पेड़ पर झूलते रहे। चार जून की रात अपने सशस्त्र साथियों के साथ महराज सिंह बावनी इमली आये और शवों को उतारकर शिवराजपुर में इन नरकंकालोंकी अंत्येष्टि की।
यमुना नदी के तट पर स्थित रेंह बहुत ही प्राचीन गांव है। यह गांव फतेहपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि इस जगह से 800 ई. पूर्व के पुरातात्त्विक महत्व से जुड़े लेख प्राप्त हुए थे। इसके अलावा मौर्य काल, कुषाण काल और गुप्त काल के कई सिक्के और मूर्तियां प्राप्त हुई थी। दो दशक पूर्व भवगान विष्णु की प्राचीन मूर्ति इस गांव से प्राप्त हुई थी। वर्तमान समय में यह मूर्ति कीर्तिखेडा गांव के मंदिर में स्थापित है।
उत्तरवाहिनी पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित भिटौरा विकास खंड मुख्यालय के रूप में स्थित है है। यह वह स्थान है जहां संत भृगु ने काफी लम्बे समय तक तपस्या की थी। इसी कारण इस जगह को भृगु ठौर के नाम से भी जाता है। यहां गंगा नदी उत्तर दिशा से प्रवाहित हो रही है इसी कारन यंहा का पौराणिक महत्व के साथ -साथ धार्मिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।
यह स्थान महान स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रसिद्ध उर्दू कवि श्री इकबाल वर्मा की जन्मभूमि है।
आगे कोशिश करूंगा की आप सभी को और फतेहपुर के बारे में और परिचित करा सकूं ।
यमुना नदी के तट पर स्थित रेंह बहुत ही प्राचीन गांव है। यह गांव फतेहपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि इस जगह से 800 ई. पूर्व के पुरातात्त्विक महत्व से जुड़े लेख प्राप्त हुए थे। इसके अलावा मौर्य काल, कुषाण काल और गुप्त काल के कई सिक्के और मूर्तियां प्राप्त हुई थी। दो दशक पूर्व भवगान विष्णु की प्राचीन मूर्ति इस गांव से प्राप्त हुई थी। वर्तमान समय में यह मूर्ति कीर्तिखेडा गांव के मंदिर में स्थापित है।
उत्तरवाहिनी पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित भिटौरा विकास खंड मुख्यालय के रूप में स्थित है है। यह वह स्थान है जहां संत भृगु ने काफी लम्बे समय तक तपस्या की थी। इसी कारण इस जगह को भृगु ठौर के नाम से भी जाता है। यहां गंगा नदी उत्तर दिशा से प्रवाहित हो रही है इसी कारन यंहा का पौराणिक महत्व के साथ -साथ धार्मिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।
यह स्थान महान स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रसिद्ध उर्दू कवि श्री इकबाल वर्मा की जन्मभूमि है।
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