विसर्जन तो पहले भी होता था …….

विसर्जन तो पहले भी होता था, लेकिन तब अलग-अलग लोग अपने घरों से गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां लाकर चुपचाप गंगा मां की गोद में डाल देते थे। जागरण की पहल पर पहली बार चेतना जागी तो गली-मुहल्लों में लोग घर-घर से मूर्तियों का संग्रह करने निकले। गंगा मैया के इन सपूतों ने बाकायदा भव्य यात्रा निकालकर संग्रहीत करीब 20 हजार मूर्तियों का गंगा तीरे भूविसर्जन किया तो मैया के आंचल को दूषित करने वाला एक और मिथक समाधिस्थ हो गया।

दैनिक जागरण के गंगा बचाओ अभियान का असर यह रहा कि पहली बार गंगा में प्रवाहित की जाने वाली लक्ष्मी, गणेश की मूर्तियों का भूमि विसर्जन कर एक मिसाल प्रस्तुत की गयी।

इन मूर्तियों का वजन बीस टन से अधिक था। गंदगी गंगा में पहुंचने से रोकी गयी। मूर्ति संकलन के अभियान में लगे कार्यकर्ताओं के चेहरे उस समय खुशी से खिल उठे जब पांच ट्राली मूर्तियां एक साथ एक बड़े गड्ढे में विसर्जित की गयीं। अविरल गंगा, निर्मल गंगा के जयकारों के बीच कार्यकर्ता एक-एक लक्ष्मी, गणेश की मूर्ति को गड्ढे में सहेजते रहे। इस तरह से तकरीबन बीस हजार मूर्तियां एक बड़े क्षेत्रफल में तैयार किये गये गड्ढे में विसर्जित की गयीं। पहले मूर्तियों को संगम के जल से स्नान कराया गया फिर चंदन, अक्षत, फूल माला से पूजा, अर्चना करने के बाद आरती की गयी। स्वामी विज्ञानानन्द जी की मौजूदगी में ओम घाट में जहां पर दुर्गा प्रतिमाओं का भूमि विसर्जन किया गया था उसी के बगल में लक्ष्मी, गणेश की पुरानी मूर्तियों का भूमि विसर्जन हुआ। लक्ष्मी, गणेश की पुरानी मूर्तियों की महाविसर्जन यात्रा सुबह से ही शुरू हो गयी थी। आठ बजे से कार्यकर्ता संकलित स्थानों पर जा-जाकर मूर्तियां ट्रैक्टर की ट्राली में रखते रहे। दोपहर बारह बजे पांच ट्राली मूर्तियां जब संकलित हो गयीं तो अलग-अलग संगठनों के बैनर तले यात्रा निकाली गयी। जिस मार्ग से लक्ष्मी, गणेश कर रहे पुकार, मत रोको गंगा की धार, हम सबने यह ठाना है गंगा को बचाना है के जयकारों के साथ यात्रा निकली। महिलायें व बच्चे संकलित स्थानों पर आकर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते रहे और हाथ बंटाकर मूर्तियों को ट्रैक्टर ट्राली में रखवाने में सहयोग करते रहे। आगे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें

विसर्जन तो पहले भी होता था …….

विसर्जन तो पहले भी होता था, लेकिन तब अलग-अलग लोग अपने घरों से गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां लाकर चुपचाप गंगा मां की गोद में डाल देते थे। जागरण की पहल पर पहली बार चेतना जागी तो गली-मुहल्लों में लोग घर-घर से मूर्तियों का संग्रह करने निकले। गंगा मैया के इन सपूतों ने बाकायदा भव्य यात्रा निकालकर संग्रहीत करीब 20 हजार मूर्तियों का गंगा तीरे भूविसर्जन किया तो मैया के आंचल को दूषित करने वाला एक और मिथक समाधिस्थ हो गया।

दैनिक जागरण के गंगा बचाओ अभियान का असर यह रहा कि पहली बार गंगा में प्रवाहित की जाने वाली लक्ष्मी, गणेश की मूर्तियों का भूमि विसर्जन कर एक मिसाल प्रस्तुत की गयी।

इन मूर्तियों का वजन बीस टन से अधिक था। गंदगी गंगा में पहुंचने से रोकी गयी। मूर्ति संकलन के अभियान में लगे कार्यकर्ताओं के चेहरे उस समय खुशी से खिल उठे जब पांच ट्राली मूर्तियां एक साथ एक बड़े गड्ढे में विसर्जित की गयीं। अविरल गंगा, निर्मल गंगा के जयकारों के बीच कार्यकर्ता एक-एक लक्ष्मी, गणेश की मूर्ति को गड्ढे में सहेजते रहे। इस तरह से तकरीबन बीस हजार मूर्तियां एक बड़े क्षेत्रफल में तैयार किये गये गड्ढे में विसर्जित की गयीं। पहले मूर्तियों को संगम के जल से स्नान कराया गया फिर चंदन, अक्षत, फूल माला से पूजा, अर्चना करने के बाद आरती की गयी। स्वामी विज्ञानानन्द जी की मौजूदगी में ओम घाट में जहां पर दुर्गा प्रतिमाओं का भूमि विसर्जन किया गया था उसी के बगल में लक्ष्मी, गणेश की पुरानी मूर्तियों का भूमि विसर्जन हुआ। लक्ष्मी, गणेश की पुरानी मूर्तियों की महाविसर्जन यात्रा सुबह से ही शुरू हो गयी थी। आठ बजे से कार्यकर्ता संकलित स्थानों पर जा-जाकर मूर्तियां ट्रैक्टर की ट्राली में रखते रहे। दोपहर बारह बजे पांच ट्राली मूर्तियां जब संकलित हो गयीं तो अलग-अलग संगठनों के बैनर तले यात्रा निकाली गयी। जिस मार्ग से लक्ष्मी, गणेश कर रहे पुकार, मत रोको गंगा की धार, हम सबने यह ठाना है गंगा को बचाना है के जयकारों के साथ यात्रा निकली। महिलायें व बच्चे संकलित स्थानों पर आकर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते रहे और हाथ बंटाकर मूर्तियों को ट्रैक्टर ट्राली में रखवाने में सहयोग करते रहे। आगे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें

बीस हजार पुरानी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां चिन्हित स्थानों पर पहुँची

नव उज्जवल जलधार हार हीरक सी सोहति, बिच-बिच छहरति बूंद मध्य मुक्तामनि सोहति। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की इन पंक्तियों में मां भागीरथी का जो स्वरूप दर्शाया गया उसे लाने के लिये भक्तों के कदम आगे बढ़ गये हैं। सदियों से करोड़ों लोगों को मोक्ष देने वाली मोक्षदायिनी को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिये युवा हों या महिलायें, बच्चे व बूढ़े भी सजग प्रहरी बनकर हाथ बढ़ा रहे हैं। पतित पावनी की उज्जवल धार मैली न हो इसके लिये लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों का जलप्रवाह रोकने के दैनिक जागरण द्वारा चलाये जा रहे अभियान के छठे दिन तीन हजार से अधिक मूर्तियां संकलित की गयीं। अब तकबीस हजार पुरानी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां चिन्हित स्थानों पर पहुंच गयी हैं। गंगा को बचाना है। यह बात अब घर-घर पहुंच गयी है

तभी तो मूर्तियों के भू विसर्जन में महिलायें व बच्चे आगे आ रहे हैं। लक्ष्मी, गणेश की पुरानी मूर्तियों के पंद्रह नवंबर तक संकलन के अभियान में एक कड़ी उस समय और जुड़ गयी जब अहमद गंज की महिलायें जागरण की प्रेरणा से घर से निकलकर मूर्तियां संकलित करने में जुट गयीं। आगे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें

बीस हजार पुरानी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां चिन्हित स्थानों पर पहुँची

नव उज्जवल जलधार हार हीरक सी सोहति, बिच-बिच छहरति बूंद मध्य मुक्तामनि सोहति। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की इन पंक्तियों में मां भागीरथी का जो स्वरूप दर्शाया गया उसे लाने के लिये भक्तों के कदम आगे बढ़ गये हैं। सदियों से करोड़ों लोगों को मोक्ष देने वाली मोक्षदायिनी को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिये युवा हों या महिलायें, बच्चे व बूढ़े भी सजग प्रहरी बनकर हाथ बढ़ा रहे हैं। पतित पावनी की उज्जवल धार मैली न हो इसके लिये लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों का जलप्रवाह रोकने के दैनिक जागरण द्वारा चलाये जा रहे अभियान के छठे दिन तीन हजार से अधिक मूर्तियां संकलित की गयीं। अब तकबीस हजार पुरानी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां चिन्हित स्थानों पर पहुंच गयी हैं। गंगा को बचाना है। यह बात अब घर-घर पहुंच गयी है

तभी तो मूर्तियों के भू विसर्जन में महिलायें व बच्चे आगे आ रहे हैं। लक्ष्मी, गणेश की पुरानी मूर्तियों के पंद्रह नवंबर तक संकलन के अभियान में एक कड़ी उस समय और जुड़ गयी जब अहमद गंज की महिलायें जागरण की प्रेरणा से घर से निकलकर मूर्तियां संकलित करने में जुट गयीं। आगे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें

गंगा अब मैली नहीं रहेंगी

जीवनदायिनी मां गंगा अब मैली नहीं रहेंगी। कुछ ऐसी ही खुशियां संजोये गंगा भक्त उस समय बल्लियों उछल पड़े जब सुना कि प्रधानमंत्री ने मोक्षदायिनी को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया है। सबका पाप और ताप धोते-धोते मैली होती जा रही गंगा के अस्तित्व को लेकर आम व्यक्ति भी गंगा बचाने के लिये आगे गये थे। राष्ट्रीय नदी घोषित हो जाने के बाद संत हों या संगठन सभी यही कहते हैं कि अब सामाजिक पहल ही रंग लायेगी। आस्था के नाम पर गंगा में फैलाये जा रहे प्रदूषण को रोकने के लिये अब कड़ा कानून लागू करना होगा तभी शव प्रवाह सहित आस्था के नाम पर प्रवाहित की जाने वाली गंदगी रुक पायेगी।

सुरसरि का बिगड़ता जा रहा स्वरूप मानवीय संवेदनाओं को तो झकझोर ही रहा है अविरल निर्मल बहने वाली सतत गंगा का अस्तित्व भी संकट में आता दिखने लगा था। जिले में अस्सी किमी क्षेत्रफल में भागीरथी की अविरल धार बहती है। भृगुधाम भिटौरा में उत्तर वाहिनी गंगा हैं जो कि गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक में मात्र तीन स्थानों में हरिद्वार काशी में ही हैं। उत्तरवाहिनी गंगा होने के कारण भिटौरा घाट में गंगा में डुबकी लगाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कुछ ज्यादा ही रहती है।यूँ तो जिले में टेनरियों नाले के गंदे पानी से सुरसरि का पानी मैला नहीं हो पाता है, लेकिन यहां आस्था के नाम पर जो प्रदूषण फैलाया जाता है उसी से मां का आंचल गंदा हो रहा है। भिटौरा के श्मशान घाट में प्रतिदिन आठ से दस शव प्रवाह किये जाते हैं। शव के साथ आने वाली गंदगी भी मोक्षदायिनी के तट पर फेंक दी जाती है जो सड़ांध से पानी को मैला करने के साथ दुर्गध भी फैलाती है। इसी प्रकार नौबस्ता, शिवराजपुर, कोटिया, गुनीर आदि गंगा घाटों में शवों के प्रवाह से पानी को मैला किया जाता है।

निष्प्रयोज्य पूजन सामग्री के साथ मूर्तियों के विसर्जन से गंगा को मैली होने से बचाने के लिये जागरण ने गंगा को बचाना है का अभियान जो चलाया उससे काफी हद तक जागरूकता हुई। दुर्गा पूजा महोत्सव में पहली बार एक सैकड़ा से अधिक मूर्तियों का भू-विसर्जन करके गंगा भक्तों ने पतित पावनी को बचाने की जो पहल की आज उसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्वीकारने के साथ ही भक्तों का उत्साह चौगुना हो गया है। आखिर उनकी छोटी सी आहुति रंग लायी। शायद यह सोचकर वह बल्लियों उछल रहे हैं। भिटौरा स्थित ओम घाट में स्वामी विज्ञानानंद के नेतृत्व में संतों ने मां गंगा की पूजा, अर्चना कर यह संकल्प लिया कि राष्ट्रीय धरोहर बनी मोक्षदायिनी नदी को हम कभी गंदा नहीं होने देंगे। स्वामी विज्ञानानंद ने प्रधानमंत्री की इस पहल पर बधाई देते हुए कहा कि हमारी नहीं मां गंगा की पुकार दिल्ली की कुर्सी में बैठे जिम्मेदार लोगों तक पहुंच गयी। अब हम सभी का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह गंगा नदी को मैला होने दें।

गंगा अब मैली नहीं रहेंगी

जीवनदायिनी मां गंगा अब मैली नहीं रहेंगी। कुछ ऐसी ही खुशियां संजोये गंगा भक्त उस समय बल्लियों उछल पड़े जब सुना कि प्रधानमंत्री ने मोक्षदायिनी को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया है। सबका पाप और ताप धोते-धोते मैली होती जा रही गंगा के अस्तित्व को लेकर आम व्यक्ति भी गंगा बचाने के लिये आगे गये थे। राष्ट्रीय नदी घोषित हो जाने के बाद संत हों या संगठन सभी यही कहते हैं कि अब सामाजिक पहल ही रंग लायेगी। आस्था के नाम पर गंगा में फैलाये जा रहे प्रदूषण को रोकने के लिये अब कड़ा कानून लागू करना होगा तभी शव प्रवाह सहित आस्था के नाम पर प्रवाहित की जाने वाली गंदगी रुक पायेगी।

सुरसरि का बिगड़ता जा रहा स्वरूप मानवीय संवेदनाओं को तो झकझोर ही रहा है अविरल निर्मल बहने वाली सतत गंगा का अस्तित्व भी संकट में आता दिखने लगा था। जिले में अस्सी किमी क्षेत्रफल में भागीरथी की अविरल धार बहती है। भृगुधाम भिटौरा में उत्तर वाहिनी गंगा हैं जो कि गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक में मात्र तीन स्थानों में हरिद्वार काशी में ही हैं। उत्तरवाहिनी गंगा होने के कारण भिटौरा घाट में गंगा में डुबकी लगाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कुछ ज्यादा ही रहती है।यूँ तो जिले में टेनरियों नाले के गंदे पानी से सुरसरि का पानी मैला नहीं हो पाता है, लेकिन यहां आस्था के नाम पर जो प्रदूषण फैलाया जाता है उसी से मां का आंचल गंदा हो रहा है। भिटौरा के श्मशान घाट में प्रतिदिन आठ से दस शव प्रवाह किये जाते हैं। शव के साथ आने वाली गंदगी भी मोक्षदायिनी के तट पर फेंक दी जाती है जो सड़ांध से पानी को मैला करने के साथ दुर्गध भी फैलाती है। इसी प्रकार नौबस्ता, शिवराजपुर, कोटिया, गुनीर आदि गंगा घाटों में शवों के प्रवाह से पानी को मैला किया जाता है।

निष्प्रयोज्य पूजन सामग्री के साथ मूर्तियों के विसर्जन से गंगा को मैली होने से बचाने के लिये जागरण ने गंगा को बचाना है का अभियान जो चलाया उससे काफी हद तक जागरूकता हुई। दुर्गा पूजा महोत्सव में पहली बार एक सैकड़ा से अधिक मूर्तियों का भू-विसर्जन करके गंगा भक्तों ने पतित पावनी को बचाने की जो पहल की आज उसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्वीकारने के साथ ही भक्तों का उत्साह चौगुना हो गया है। आखिर उनकी छोटी सी आहुति रंग लायी। शायद यह सोचकर वह बल्लियों उछल रहे हैं। भिटौरा स्थित ओम घाट में स्वामी विज्ञानानंद के नेतृत्व में संतों ने मां गंगा की पूजा, अर्चना कर यह संकल्प लिया कि राष्ट्रीय धरोहर बनी मोक्षदायिनी नदी को हम कभी गंदा नहीं होने देंगे। स्वामी विज्ञानानंद ने प्रधानमंत्री की इस पहल पर बधाई देते हुए कहा कि हमारी नहीं मां गंगा की पुकार दिल्ली की कुर्सी में बैठे जिम्मेदार लोगों तक पहुंच गयी। अब हम सभी का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह गंगा नदी को मैला होने दें।

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.