भोजन की गुणवत्ता में सुधार के लिए शासन ने कनवर्जन कास्ट में बढ़ोत्तरी की

मिड-डे मील योजना के भोजन की गुणवत्ता में सुधार के लिए शासन ने कनवर्जन कास्ट में बढ़ोत्तरी कर दी है। यह बढ़ोत्तरी पहले जनवरी से लागू हो जाएगी। बढ़ी धनराशि संबंधित खाते में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।परिषदीय प्राइमरी और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में मिड-डे मील योजना के तहत दोपहर में बच्चों को वितरित किए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता में सुधार होगा। इसके लिए शासन प्राथमिक स्कूल के प्रति छात्र प्रतिदिन 52 पैसे और जूनियर में 40 पैसे की बढ़ोत्तरी की गई है। पहली जनवरी 2009 से प्राइमरी में कनवर्जन कास्ट 2.60 पैसे और जूनियर में प्रति छात्र तीन रुपए मिलेगी। अभी तक प्राइमरी में 2.08 पैसे और जूनियर में 2.60 पैसे मिलती रही है।
मिड-डे मील योजना के जिला समन्वयक आशीष दीक्षित का कहना है कि शासन कनवर्जन कास्ट में बढ़ोत्तरी करने का निर्णय महंगाई को देखते हुए किया गया है। इस धनराशि से अब बच्चों को पहले से बेहतर भोजन परोसा जा सकेगा।

मिड डे मील योजना का संचालन जनप्रतिनिधियों से छीनने का निर्णय

बेसिक शिक्षा विभाग ने नगर क्षेत्र में मिड डे मील योजना का संचालन जनप्रतिनिधियों से छीनने का निर्णय लिया है। अगले महीने से शहर के कुल 40 प्राइमरी स्कूलों के 3402 बच्चों को स्वयं सेवी संस्थाएं भोजन का वितरण करेंगी। इसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गईं हैं। जिलाधिकारी सौरभ बाबू के आदेश पर बेसिक शिक्षा विभाग ने आवेदन मांगा हैं, 38 संस्थाओं ने आवेदन किया है। इन संस्थाओं में बहुतायत गैर जिलों से संबंध रखती हैं।मालूम हो कि नगर पालिका परिषद क्षेत्र में कुल 40 शिक्षण संस्थाओं में मिडडे मील योजना के तहत दोपहर का भोजन वितरित करने की व्यवस्था है। इनमें 9 वैकल्पिक शिक्षा केंद्र और शेष प्राइमरी स्कूल हैं। इन सभी में 3402 बच्चों को भोजन परोसने की जिम्मेदारी सभासदों को दी गई, जिसके लिए 100 ग्राम प्रति बच्चे के हिसाब से खाद्यान्न और दो रुपए कनवर्जन कास्ट दिया जाता है। इसके बावजूद अधिकांश विद्यालयों में भोजन का वितरण पूरी तरह से अभिलेखों तक सीमित है।
ऐसी हालत में बेसिक शिक्षा विभाग ने सभी विद्यालयों में भोजन वितरण कराने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया। इसके लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं हैं। मिडडे मील योजना का क्रियान्वयन करने के लिए कुल 38 स्वयं सेवी संस्थाओं ने आवेदन किया है। एक बार सभी पत्रावलियां डीएम के समक्ष पेश की गईं हैं, लेकिन इनमें अनुभव प्रमाण पत्र न होने के कारण उन्होंने वापस कर दिया था। अगले हफ्ते सभी पत्रावलियां अनुभव प्रमाण पत्र के साथ डीएम के समक्ष पेश की जाएंगी। ऐसी हालत में साफ है कि अगले सप्ताह किसी संस्था को यह जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी।
बेसिक शिक्षा अधिकारी राजकुमार पंडित का कहना है कि किसी भी योजना का क्रियान्वयन जिलाधिकारी के दिशा निर्देश पर कराया जाता है। मिडडे मील योजना के क्रियान्वयन में गड़बड़ी को देखते हुए डीएम ने यह जिम्मेदारी स्वयं सेवी संस्थाओं को सौंपने का निर्णय लिया है। इसके लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। संबंधित पत्रावलियां तैयार हैं। जल्द ही पत्रावलियां अधिकारी के समक्ष पेश कर दी जाएंगी।

( समाचार साभारअमर उजाला )

मिड डे मील योजना का संचालन जनप्रतिनिधियों से छीनने का निर्णय

बेसिक शिक्षा विभाग ने नगर क्षेत्र में मिड डे मील योजना का संचालन जनप्रतिनिधियों से छीनने का निर्णय लिया है। अगले महीने से शहर के कुल 40 प्राइमरी स्कूलों के 3402 बच्चों को स्वयं सेवी संस्थाएं भोजन का वितरण करेंगी। इसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गईं हैं। जिलाधिकारी सौरभ बाबू के आदेश पर बेसिक शिक्षा विभाग ने आवेदन मांगा हैं, 38 संस्थाओं ने आवेदन किया है। इन संस्थाओं में बहुतायत गैर जिलों से संबंध रखती हैं।मालूम हो कि नगर पालिका परिषद क्षेत्र में कुल 40 शिक्षण संस्थाओं में मिडडे मील योजना के तहत दोपहर का भोजन वितरित करने की व्यवस्था है। इनमें 9 वैकल्पिक शिक्षा केंद्र और शेष प्राइमरी स्कूल हैं। इन सभी में 3402 बच्चों को भोजन परोसने की जिम्मेदारी सभासदों को दी गई, जिसके लिए 100 ग्राम प्रति बच्चे के हिसाब से खाद्यान्न और दो रुपए कनवर्जन कास्ट दिया जाता है। इसके बावजूद अधिकांश विद्यालयों में भोजन का वितरण पूरी तरह से अभिलेखों तक सीमित है।
ऐसी हालत में बेसिक शिक्षा विभाग ने सभी विद्यालयों में भोजन वितरण कराने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया। इसके लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं हैं। मिडडे मील योजना का क्रियान्वयन करने के लिए कुल 38 स्वयं सेवी संस्थाओं ने आवेदन किया है। एक बार सभी पत्रावलियां डीएम के समक्ष पेश की गईं हैं, लेकिन इनमें अनुभव प्रमाण पत्र न होने के कारण उन्होंने वापस कर दिया था। अगले हफ्ते सभी पत्रावलियां अनुभव प्रमाण पत्र के साथ डीएम के समक्ष पेश की जाएंगी। ऐसी हालत में साफ है कि अगले सप्ताह किसी संस्था को यह जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी।
बेसिक शिक्षा अधिकारी राजकुमार पंडित का कहना है कि किसी भी योजना का क्रियान्वयन जिलाधिकारी के दिशा निर्देश पर कराया जाता है। मिडडे मील योजना के क्रियान्वयन में गड़बड़ी को देखते हुए डीएम ने यह जिम्मेदारी स्वयं सेवी संस्थाओं को सौंपने का निर्णय लिया है। इसके लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। संबंधित पत्रावलियां तैयार हैं। जल्द ही पत्रावलियां अधिकारी के समक्ष पेश कर दी जाएंगी।

( समाचार साभारअमर उजाला )

नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील की ढुलमुल व्यवस्था से प्रशासन भी आजिज

नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील की ढुलमुल व्यवस्था से प्रशासन भी आजिज आ गया है। किचन शेड कूड़ाघर बन गये हैं और सभासद के घरों में चूल्हा जल रहे हैं। आधे स्कूल तो ऐसे हैं जहां मीनू के अनुसार खाना देने के बजाय डबल रोटी व बिस्कुट से ही बच्चों का पेट भरा जा रहा है। जल्द ही नगर की व्यवस्था किसी स्वयंसेवी संस्था के हाथों में सौंपने की रणनीति के तहत शिक्षा विभाग ने आवेदन मांग लिये हैं। नगर में तो यह प्रयोग किया जा रहा है। यदि यह सफल रहा तो ऐसी ग्राम पंचायतों में जहां प्रधान बच्चों को मिड-डे-मील सही ढंग से नहीं दे पा रहे हैं वहां भी संस्थाओं को यह जिम्मेदारी दे दी जायेगी।

कुपोषण को दूर कर बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिहाज से शुरू की गयी मिड-डे-मील योजना खामियों का शिकार हो गयी है। ग्राम प्रधान हों या फिर सभासद बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता किसी को नहीं है। गुणवत्तायुक्त भोजन तो कहीं दिया ही नहीं जा रहा। कुछ ऐसे विद्यालय हैं जहां के बच्चों को या तो भूखे पेट लौटना पड़ता है या फिर घटिया भोजन फेंककर आना पड़ता है। सप्ताह भर के अलग-अलग तय मीनू में इस तरह का खिलवाड़ किया जाता है कि बच्चे खाना देखते ही भिनक जाते हैं। शहर के तो कई स्कूल ऐसे हैं जहां मानक से आधा खाने की भी खपत नहीं होती है। एक विद्यालय संचालक ने बताया कि एक माह का खाद्यान्न तीन माह तक भी नहीं खप पाया है। शहर के बच्चों को यह खाना अच्छा ही नहीं लगता है।

मजे की बात तो यह है कि परिषदीय स्कूलों में किचन शेड बने हुए हैं, लेकिन किसी में खाना नहीं बन रहा है। सभासदों के घर चूल्हा जलता है और वहीं से रिक्शे में भगोना रखकर स्कूल लाया जाता है। कई बार चेतावनी के बाद भी सभासद किचन शेड में खाना बनवाना सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। एक दर्जन स्कूल तो ऐसे हैं जहां बच्चों को पका और गर्म भोजन देने के बजाय सभासद डबल रोटी व बिस्कुट के पैकेट भेजकर काम चला रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह जानकारी शिक्षा विभाग के अधिकारियों व प्रशासन को नहीं है। पिछले दिनों जिलाधिकारी ने नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील की घटिया व्यवस्था पर बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिये थे कि स्वयंसेवी संस्थाओं के आवेदन लिये जायें। विभाग ने विज्ञापन जारी कर आवेदन मांगे हैं जिसमें अभी तक एक दर्जन संस्थाओं ने दावा किया है। बताते हैं कि जल्द ही नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील व्यवस्था किसी सशक्त स्वयंसेवी संस्था के हाथ में सौंप दी जायेगी। प्रशासन नगर का यह प्रयोग ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रभावी करने का मन बना रहा है। तीन दर्जन से अधिकग्राम पंचायतें ऐसी हैं जहां नोटिस देने के बाद भी मिड-डे-मील व्यवस्था सुधर नहीं रही है।

बेसिक शिक्षा अधिकारी आरके पंडित ने यह स्वीकार किया कि स्वयं सेवी संस्थाओं से कोटेशन सहित आवेदन मांगा गया है। उन्होंने कहा कि परीक्षण करने के बाद संस्थाओं का साक्षात्कार लिया जायेगा। नियम और शर्तो के साथ ही यह व्यवस्था प्रभावी की जायेगी।

(साभार- जागरण न्यूज)

नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील की ढुलमुल व्यवस्था से प्रशासन भी आजिज

नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील की ढुलमुल व्यवस्था से प्रशासन भी आजिज आ गया है। किचन शेड कूड़ाघर बन गये हैं और सभासद के घरों में चूल्हा जल रहे हैं। आधे स्कूल तो ऐसे हैं जहां मीनू के अनुसार खाना देने के बजाय डबल रोटी व बिस्कुट से ही बच्चों का पेट भरा जा रहा है। जल्द ही नगर की व्यवस्था किसी स्वयंसेवी संस्था के हाथों में सौंपने की रणनीति के तहत शिक्षा विभाग ने आवेदन मांग लिये हैं। नगर में तो यह प्रयोग किया जा रहा है। यदि यह सफल रहा तो ऐसी ग्राम पंचायतों में जहां प्रधान बच्चों को मिड-डे-मील सही ढंग से नहीं दे पा रहे हैं वहां भी संस्थाओं को यह जिम्मेदारी दे दी जायेगी।

कुपोषण को दूर कर बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिहाज से शुरू की गयी मिड-डे-मील योजना खामियों का शिकार हो गयी है। ग्राम प्रधान हों या फिर सभासद बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता किसी को नहीं है। गुणवत्तायुक्त भोजन तो कहीं दिया ही नहीं जा रहा। कुछ ऐसे विद्यालय हैं जहां के बच्चों को या तो भूखे पेट लौटना पड़ता है या फिर घटिया भोजन फेंककर आना पड़ता है। सप्ताह भर के अलग-अलग तय मीनू में इस तरह का खिलवाड़ किया जाता है कि बच्चे खाना देखते ही भिनक जाते हैं। शहर के तो कई स्कूल ऐसे हैं जहां मानक से आधा खाने की भी खपत नहीं होती है। एक विद्यालय संचालक ने बताया कि एक माह का खाद्यान्न तीन माह तक भी नहीं खप पाया है। शहर के बच्चों को यह खाना अच्छा ही नहीं लगता है।

मजे की बात तो यह है कि परिषदीय स्कूलों में किचन शेड बने हुए हैं, लेकिन किसी में खाना नहीं बन रहा है। सभासदों के घर चूल्हा जलता है और वहीं से रिक्शे में भगोना रखकर स्कूल लाया जाता है। कई बार चेतावनी के बाद भी सभासद किचन शेड में खाना बनवाना सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। एक दर्जन स्कूल तो ऐसे हैं जहां बच्चों को पका और गर्म भोजन देने के बजाय सभासद डबल रोटी व बिस्कुट के पैकेट भेजकर काम चला रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह जानकारी शिक्षा विभाग के अधिकारियों व प्रशासन को नहीं है। पिछले दिनों जिलाधिकारी ने नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील की घटिया व्यवस्था पर बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिये थे कि स्वयंसेवी संस्थाओं के आवेदन लिये जायें। विभाग ने विज्ञापन जारी कर आवेदन मांगे हैं जिसमें अभी तक एक दर्जन संस्थाओं ने दावा किया है। बताते हैं कि जल्द ही नगर क्षेत्र की मिड-डे-मील व्यवस्था किसी सशक्त स्वयंसेवी संस्था के हाथ में सौंप दी जायेगी। प्रशासन नगर का यह प्रयोग ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रभावी करने का मन बना रहा है। तीन दर्जन से अधिकग्राम पंचायतें ऐसी हैं जहां नोटिस देने के बाद भी मिड-डे-मील व्यवस्था सुधर नहीं रही है।

बेसिक शिक्षा अधिकारी आरके पंडित ने यह स्वीकार किया कि स्वयं सेवी संस्थाओं से कोटेशन सहित आवेदन मांगा गया है। उन्होंने कहा कि परीक्षण करने के बाद संस्थाओं का साक्षात्कार लिया जायेगा। नियम और शर्तो के साथ ही यह व्यवस्था प्रभावी की जायेगी।

(साभार- जागरण न्यूज)

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