अमौली का पंद्रह दिवसीय ऐतिहासिक मेला प्रारंभ

शुक्रवार को भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा अहंकारी रावण का वध करने के साथ ही अमौली का पंद्रह दिवसीय ऐतिहासिक मेला प्रारंभ हो गया। मेले का उद्घाटन क्षेत्रीय विधायक ने फीता काटकर किया।

अमौली के ऐतिहासिक मेले की तैयारियां एक माह पूर्व से हो रही थी। शुक्रवार को मंडी समिति मैदान से राम रावण का दल चला जो मुख्य मार्गो से होते हुये मेला मैदान पहुंचे। अपराह्न लगभग तीन बजे जहानाबाद क्षेत्र के विधायक आदित्य पांडेय, उपजिलाधिकारी अरुण कुमार शुक्ल बसपा जिलाध्यक्ष सुनील गौतम उद्घाटन स्थल पर पहुंचे। जहां पर विधायक पांडे ने फीता काटकर मेले का शुभारंभ किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि अमौली का यह मेला सैकड़ों वर्ष पुराना है। इसको आगे सैकड़ों वर्ष जीवंत रखना विकसित करना हम सब का कर्तव्य है। उन्होंने रामलीला के लिये पक्का चबूतरा बनवाने की योजना भी बनी। उधर मेला मैदान में भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम अहंकारी दुष्ट रावण के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया था। राम द्वारा रावण के पूरे शरीर को वाणों से वेध डालने के बावजूद वह अट्ठहास करता रहा। अंत में जब राम का एक वाण दुष्ट रावण के नाभि में लगा तो रावण धरती पर गिर पड़ा और मौत की आगोश में समा गया। रावण के वध होते ही पूरा मेला मैदान जय जय श्री राम के उद्घोष से सराबोर हो गया।

अमोली में हर तरह की दुकानें लगी हुयी थीं। महिला पुरुष मूसानगर की प्रसिद्ध लोहे की कड़ाही खरीदने में मशगूल दिखे। नन्हे-मुन्ने बच्चे माता-पिता से गुब्बारा छोटे झूलों के लिये मचल रहे थे। वहीं नवयुवक स्त्रियां आसमानी झूले का मजा ले रहे थे।

(साभार-दैनिक जागरण)

खजुहा की रामलीला


फतेहपुर जिले के खजुहा कस्बे में रामनगर शैली में रामलीला तो होती ही है साथ ही रावण को उतना ही सम्मान दिया जाता है जितना कि दक्षिण भारत में। यहाँ पुतले को जलाने के स्थान पर उसकी आरती वंदना की जाती है। इस रामलीला की शुरुआत लगभग ४०० वर्ष पूर्व हुई थी जिसका उल्लेख “वंशावली” पुस्तक में मिलता है। लीला का प्रारंभ विजयादशमी से होता है। रावण के लगभग ५०-६० फ़िट लम्बे व २०-२५ फ़िट चौड़े आकृति की आरती हजार बत्तियों से की जाती है। प्रसाद एवं भोग सात्त्विक होता है। दिन में रावण-मन्दोदरी, मेघनाद, कुम्भकर्ण एवं विभीषण आदि ७ राक्षसों और बानरों तथा हाथी घोड़े आदि के विशालकाय पुतलों को नगर में घुमाया जाता है। रात्रि में खुले आसमान के नीचे रामलीला को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। दर्शनार्थियों की संख्या लाखों में होती है। इस प्रकार उत्तर भारत में रावण को सम्मान प्रदान करने वाली एक मात्र खजुहा की रामलीला ही है।

खजुहा की रामलीला


फतेहपुर जिले के खजुहा कस्बे में रामनगर शैली में रामलीला तो होती ही है साथ ही रावण को उतना ही सम्मान दिया जाता है जितना कि दक्षिण भारत में। यहाँ पुतले को जलाने के स्थान पर उसकी आरती वंदना की जाती है। इस रामलीला की शुरुआत लगभग ४०० वर्ष पूर्व हुई थी जिसका उल्लेख “वंशावली” पुस्तक में मिलता है। लीला का प्रारंभ विजयादशमी से होता है। रावण के लगभग ५०-६० फ़िट लम्बे व २०-२५ फ़िट चौड़े आकृति की आरती हजार बत्तियों से की जाती है। प्रसाद एवं भोग सात्त्विक होता है। दिन में रावण-मन्दोदरी, मेघनाद, कुम्भकर्ण एवं विभीषण आदि ७ राक्षसों और बानरों तथा हाथी घोड़े आदि के विशालकाय पुतलों को नगर में घुमाया जाता है। रात्रि में खुले आसमान के नीचे रामलीला को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। दर्शनार्थियों की संख्या लाखों में होती है। इस प्रकार उत्तर भारत में रावण को सम्मान प्रदान करने वाली एक मात्र खजुहा की रामलीला ही है।

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