जनसूचना अधिकार जनता को सौंपते हुये सरकार ने आशा की थी की इसके माध्यम से आम जन सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं की वास्तविकताओं से परिचित हो सके। साथ ही दूसरी अन्य जानकारियां जो वह चाहता है उन सबकी भी उचित जानकारी समुचित ढंग से मिले। पर वास्तविकता इस अधिकार की मंशा से कोसों दूर है। जनपद भर में सभी विभागों से इस अधिकार तहत लगभग पाँच सौ सूचनायें मांगी गई हैं। जिनमें लगभग चार सौ सूचनायें विभिन्न विभागों में लंबित हैं जिनका जवाब किसी न किसी कारण नहीं दिया जा सका है। सरकारी विभागों पर अगर एक नजर डाली जाये तो आम जन को मिले इस हथियार की हकीकत सामने आ जाती है। आंकड़ों के अनुसार उन विभागों से ज्यादा सूचनाएं मांगी जा रही हैं जो सीधे तौर पर जनता से जुड़े हुए हैं। सूचना मांगने वाले इसे अपना अधिकार समझते हुए विभागों से सूचनाएं मांगते हैं और विभाग जानकारी उपलब्ध करवाने में मनमाना समय लगाते हैं। जन सूचना अधिकार एक बड़ा और महत्वपूर्ण अधिकार है जो सूचना मांगने वाले के हाथों में हथियार के जैसा है किन्तु जानकारी के अभाव में यह व्यर्थ साबित हो रहा है।
हाथ में है हथियार पर बेकार
जनसूचना अधिकार आम जनता के हाथों में सरकार द्वारा दिया गया एक दमदार और बड़ा अधिकार है जिसके माध्यम से कोई भी आदमी दस रूपये के फार्म को भरकर किसी भी विभाग से आवश्यक सूचनायें मांग सकता है। किन्तु इस बड़े अधिकार की पूरी जानकारी के अभाव में इसका सदुपयोग न होकर दुरुपयोग अधिक हो रहा है। विभाग तो जानकारी उपलब्ध करवाने में हीला हवाली करते ही हैं सूचना मांगने वाले भी कम कमाल नहीं कर रहे हैं। ऐसी सूचनायें मांगी जा रही हैं जिनका कोई मानक ही नहीं होता है। यानी एक तरफ हीला हवाली तो दूसरी तरफ मनमानी जारी है। यही नहीं यह दमदार अधिकार कुछ लोगों तक सिमट कर रह गया है जो कभी खुद तो कभी दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर अपने स्वार्थो पर निशाना लगाते हैं तो कुछ इस अधिकार के माध्यम से अपनी दोस्ती, दुश्मनी को भी अंजाम दे रहे हैं।