जब गाँधी जी हुए फतेहपुर से नाराज….

चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी ने यह भावाव्यक्ति ऐसे युग पुरुष के लिये की थी जो अहिंसा के बल पर देश को आजादी दिलायी। जब हम राष्ट्रपिता बापू की जयंती मना रहे हैं ऐसे में उन दृश्यों को याद करना जरूरी है जब वह हमारे और आपके बीच आये और कुछ ऐसी प्रेरणा दी जिससे स्वदेशी की भावना बलवती हुई और विदेशी वस्तुओं की होलियां जलने लगीं।

साबरमती के संत की अगुवाई में जब समूचा देश दासता से मुक्त होने के लिये लड़ाई लड़ रहा था उस समय उनकी झलक पाने को हर कोई लालायित था। वाक्या वर्ष 1920 का है। महात्मा गांधी ट्रेन द्वारा कानपुर से इलाहाबाद जा रहे थे। क्रांतिकारियों को जब सूचना मिली कि बापू जनपद से गुजर रहे हैं। फतेहपुर रेलवे स्टेशन में बाबू बंशगोपाल, शिवदयाल उपाध्याय, गुरुप्रसाद पांडेय, पन्नालाल गुप्त, शिवदत्त तिवारी, यदुनंदन, रघुनंदन पांडेय, देवीदयाल अग्निहोत्री सहित बड़ी तादात में लोग बापू से मिलने पहुंच गये। गाड़ी आते ही भीड़ ने महात्मा गांधी जिन्दाबाद के नारे लगाये। बापू बोगी से बाहर नहीं निकले। अपने साथी लियाकत अली को भेजकर क्रांतिकारियों से पुंछवाया की विदेशी कपड़ों की होली जलायी गयी है या नहीं। का जवाब मिलने पर उन्होंने कहा कि पहले विदेशी कपड़ों की होली जलायें इसके बाद मैं फतेहपुर आऊंगा। क्रांतिकारियों ने मिलने की अनुनय-विनय की, लेकिन वह नहीं उतरे। कुछ क्रांतिकारी तो बिना टिकट ट्रेन में बैठकर इलाहाबाद चले गये।

महात्मा गांधी दोबारा वर्ष 1929 में पत्‍‌नी कस्तूरबा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खां लियाकत अली के साथ जनपद आये। पूरा एक दिन के समय में वह फतेहपुर, बिन्दकी सहित चौडगरा स्थित फसीहाबाग स्थल पर पहुंचे और कई जगह जनसभाओं को भी संबोधित किया। बिन्दकी के रामलीला मैदान में जिस समय तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता का विगुल फूंका, क्रांतिकारी ही नहीं आम जनमानस के अंदर आजादी का जुनून सिर चढ़कर बोलने लगा। वर्ष 1929 में बापू गोपालगंज स्थित फसीहाबाग पहुंचकर अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इसके बाद यहां से पैदल बिन्दकी के रामलीला मैदान में पहुंचे। यहां पर जनसभा को संबोधित किया। फतेहपुर शहर के हजारी लाल फाटक में गांधी जी ने जनसभा करके आजादी का विगुल फूंका
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(साभार : जागरण-याहू-इंडिया )

जब गाँधी जी हुए फतेहपुर से नाराज….

चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी ने यह भावाव्यक्ति ऐसे युग पुरुष के लिये की थी जो अहिंसा के बल पर देश को आजादी दिलायी। जब हम राष्ट्रपिता बापू की जयंती मना रहे हैं ऐसे में उन दृश्यों को याद करना जरूरी है जब वह हमारे और आपके बीच आये और कुछ ऐसी प्रेरणा दी जिससे स्वदेशी की भावना बलवती हुई और विदेशी वस्तुओं की होलियां जलने लगीं।

साबरमती के संत की अगुवाई में जब समूचा देश दासता से मुक्त होने के लिये लड़ाई लड़ रहा था उस समय उनकी झलक पाने को हर कोई लालायित था। वाक्या वर्ष 1920 का है। महात्मा गांधी ट्रेन द्वारा कानपुर से इलाहाबाद जा रहे थे। क्रांतिकारियों को जब सूचना मिली कि बापू जनपद से गुजर रहे हैं। फतेहपुर रेलवे स्टेशन में बाबू बंशगोपाल, शिवदयाल उपाध्याय, गुरुप्रसाद पांडेय, पन्नालाल गुप्त, शिवदत्त तिवारी, यदुनंदन, रघुनंदन पांडेय, देवीदयाल अग्निहोत्री सहित बड़ी तादात में लोग बापू से मिलने पहुंच गये। गाड़ी आते ही भीड़ ने महात्मा गांधी जिन्दाबाद के नारे लगाये। बापू बोगी से बाहर नहीं निकले। अपने साथी लियाकत अली को भेजकर क्रांतिकारियों से पुंछवाया की विदेशी कपड़ों की होली जलायी गयी है या नहीं। का जवाब मिलने पर उन्होंने कहा कि पहले विदेशी कपड़ों की होली जलायें इसके बाद मैं फतेहपुर आऊंगा। क्रांतिकारियों ने मिलने की अनुनय-विनय की, लेकिन वह नहीं उतरे। कुछ क्रांतिकारी तो बिना टिकट ट्रेन में बैठकर इलाहाबाद चले गये।

महात्मा गांधी दोबारा वर्ष 1929 में पत्‍‌नी कस्तूरबा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खां लियाकत अली के साथ जनपद आये। पूरा एक दिन के समय में वह फतेहपुर, बिन्दकी सहित चौडगरा स्थित फसीहाबाग स्थल पर पहुंचे और कई जगह जनसभाओं को भी संबोधित किया। बिन्दकी के रामलीला मैदान में जिस समय तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता का विगुल फूंका, क्रांतिकारी ही नहीं आम जनमानस के अंदर आजादी का जुनून सिर चढ़कर बोलने लगा। वर्ष 1929 में बापू गोपालगंज स्थित फसीहाबाग पहुंचकर अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इसके बाद यहां से पैदल बिन्दकी के रामलीला मैदान में पहुंचे। यहां पर जनसभा को संबोधित किया। फतेहपुर शहर के हजारी लाल फाटक में गांधी जी ने जनसभा करके आजादी का विगुल फूंका
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राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का एक संस्मरण

एक दिन एंग्लो विद्यालय फतेहपुर में खूब सजावट की गई। कुछ समय बाद बच्चों को मिठाई वितरित की जाने लगी। धीरे-धीरे विद्यालय के अंदर और बाहर जनता को पता चला कि प्रिन्स आफ वेल्स भारत में कहीं आए हैं और उनके आने की खुशी यहां मनाई जा रही है। शहर में ऐसे लोग भी थे जो इसे खुशी का कारण नहीं मानते थे। छल तथा बल से शासन छीनने वालों की खुशी में बटने वाली मिठाई उनके लिए अपमान का प्रतीक थी। गांधी जी ने उनके आगमन का स्वागत नहीं किया। देश में ऐसे लोग भी थे जो उन्हे काले झंडे दिखा कर उनके आगमन के प्रति अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। कुछ लोग शासकों के पक्षधर थे तो कुछ विरोधी।

विरोधी लोग मन ही मन लाट साहब के आगमन को अपनी खुशी नहीं मानते थे, लेकिन शासन से बटने वाली मिठाई वापस करने का साहस वे नहीं जुटा पा रहे थे। ऐसा कर वे संभावित और आशंकित विपत्तियां निमंत्रित नहीं करते थे, अत: इस तमाशे को चुपचाप देख रहे थे। तभी सोहनलाल ने चिल्लाकर कहा, ”मुझे नहीं चाहिए यह मिठाई। यह हमारा अपमान है। हमें जलाने वाले ही नमक छिड़क रहे है।” सहसा सन्नाटा छा गया। मिठाई बंाटने वाले रुक गए। मिठाई लिए हाथ मिठाई फेंकने लगे और जो मिठाई लेने के लिए एक लंबी लाइन में लगे थे वे छिटककर हट गए। लड़कों का जुलूस फतेहपुर की गलियों में नारे लगाता घूमने लगा। सोहनलाल इस जुलूस के नेता थे।

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राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का एक संस्मरण

एक दिन एंग्लो विद्यालय फतेहपुर में खूब सजावट की गई। कुछ समय बाद बच्चों को मिठाई वितरित की जाने लगी। धीरे-धीरे विद्यालय के अंदर और बाहर जनता को पता चला कि प्रिन्स आफ वेल्स भारत में कहीं आए हैं और उनके आने की खुशी यहां मनाई जा रही है। शहर में ऐसे लोग भी थे जो इसे खुशी का कारण नहीं मानते थे। छल तथा बल से शासन छीनने वालों की खुशी में बटने वाली मिठाई उनके लिए अपमान का प्रतीक थी। गांधी जी ने उनके आगमन का स्वागत नहीं किया। देश में ऐसे लोग भी थे जो उन्हे काले झंडे दिखा कर उनके आगमन के प्रति अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। कुछ लोग शासकों के पक्षधर थे तो कुछ विरोधी।

विरोधी लोग मन ही मन लाट साहब के आगमन को अपनी खुशी नहीं मानते थे, लेकिन शासन से बटने वाली मिठाई वापस करने का साहस वे नहीं जुटा पा रहे थे। ऐसा कर वे संभावित और आशंकित विपत्तियां निमंत्रित नहीं करते थे, अत: इस तमाशे को चुपचाप देख रहे थे। तभी सोहनलाल ने चिल्लाकर कहा, ”मुझे नहीं चाहिए यह मिठाई। यह हमारा अपमान है। हमें जलाने वाले ही नमक छिड़क रहे है।” सहसा सन्नाटा छा गया। मिठाई बंाटने वाले रुक गए। मिठाई लिए हाथ मिठाई फेंकने लगे और जो मिठाई लेने के लिए एक लंबी लाइन में लगे थे वे छिटककर हट गए। लड़कों का जुलूस फतेहपुर की गलियों में नारे लगाता घूमने लगा। सोहनलाल इस जुलूस के नेता थे।

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