इस वर्ष भी ट्रामा सेंटर का लाभ मिलने की उम्मीद कम

जिले में ट्रामा सेंटर निर्माण की प्रक्रिया इतनी मंद गति से चल रही है कि इस वर्ष भी गंभीर रूप से घायलों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। हालाकि अभी तक केंद्र सरकार की ओर से ट्रामा सेंटर निर्माण के लिये दो किश्तों में धनराशि स्वास्थ्य विभाग को भेजी जा चुकी है। लेकिन अभी न तो डेटर किये जा रहे है और न ही अन्य प्रक्रिया हो रही। वहीं विभागीय सूत्रों की माने तो लखनऊ में होने वाली स्पेशल ट्रेनिंग के लिये सर्जन, स्टाफ नर्स और पैरामेडिकल के नाम भेजे गये है। मुख्य चिकित्साधीक्षक डा.राकेश कुमार का कहना है कि धनराशि तो मिल गयी है, लेकिन अभी निदेशालय से कोई निर्देश नहीं मिले। बताया कि सर्जन की छह महीने और स्टाफ नर्स तथा पैरामेडिकल की 6 महीने की स्पेशल ट्रेनिंग होगी।

ज्ञात हो कि मार्ग दुर्घटना में घायलों की हालत गंभीर होने पर डाक्टर इन्हे कानपुर या फिर इलाहाबाद रिफर कर देते हैं। जिन्हे ले जाते समय अधिकांश रास्ते में ही दम तोड़ देते है। इसके अलावा गंभीर बीमारी के रोगियों को भी दूसरे जिलों की शरण लेनी पड़ती है। केंद्र सरकार ने मरीजों की सुविधा के लिये जिले में ट्रामा सेंटर निर्माण की योजना बनायी है। इसके लिये चार करोड़ 80 लाख रूपये की पहली किश्त तथा जनवरी में 65 लाख की दूसरी किश्त में भेजी जा चुकी है। धनराशि मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया इतनी कच्छपगति से चल रहा है कि घायलों को इस वर्ष भी ट्रामा सेंटर का लाभ मिलने की उम्मीद कम नजर आ रही है।

अब थानों में रखा जाएगा बिसरा

स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता के चलते पोस्टमार्टम हाउस में 28 वर्षों से रखे करीब दस हजार बिसरा और नरकंकाल सड़ रहें हैं। तीस वर्ग फिट के जर्जर कमरे में हजारों कंटेनरों में इन्हें खोज निकालना कर्मचारियों के लिए मुश्किलों भरा है। कई कंटेनरों के टूट जाने से कई का बिसरा नष्ट हो चुका है। ऐसे में कई गुनहगार दोष मुक्त और बेगुनाह सजा की राह तक पहुंच सकते हैं। बिसरा करीब एक वर्ष में खराब हो जाता है। बावजूद इसके सीएमओ ने पुराना बिसरा नष्ट कराने की प्रक्रिया नहीं शुरू की।मृतक की मौत का कारण स्पष्ट नहीं होने पर बिसरा सुरक्षित कराया जाता है। ऐसी स्थिति में मौत का रहस्य जानने के लिए पोस्टमार्टम में चिकित्सक मृतक के शरीर से पेट, लीवर, किडनी, गालब्लैड़र, स्प्लीन, छोटी आंत, विशेष परिस्थितियों में ह्रदय फेफड़ा कंटेनर में सुरक्षित रखते हैं। जिन्हें अदालत के आदेश पर विधि विज्ञान प्रयोगशाला परीक्षण के लिए भेजा जाता है। अधिकतर मामलों के बिसरा पोस्टमार्टम हाउस में रखे रहते हैं। बताते हैं कि करीब दो दशक पूर्व मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर वर्ष 1980 तक का बिसरा नष्ट किया गया था। इसके बाद किसी भी सीएमओ की नजर इस समस्या की ओर नहीं गई।
आलम यह कि पोस्टमार्टम हाउस के छोटे से कमरे में हजारों कांच के कंटेनर एक दूसरे के ऊपर रखें हैं। बरसात में जर्जर छत का पानी कंटेनरों पर पड़ता है। इस वजह से कई कंटेनरों में पानी भर गया है। एक चिकित्सक के मुताबिक बिसरा करीब छह माह और अधिक एक वर्ष तक सुरक्षित रह सकता है। इसके बाद खराब हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसे नष्ट कर दिया जाना ही बेहतर होता है। पोस्टमार्टम हाउस के स्वीपर ने बताया कि कमरे में रखे कंटेनरों में किसी एक का बिसरा निकालने में मुश्किलों भरा काम है। उसके लिए सावधानी से कंटेनरों को बाहर निकालना पड़ता है। बिसरा नष्ट होने पर नौकरी में आंच आने का खतरा बना रहता है।


अब थानों में रखा जाएगा बिसरा

मुख्य चिकित्साधिकारी डा. वीके गुप्ता ने बताया कि पोस्टमार्टम हाउस में रखा बिसरा नष्ट कराने का अधिकार उनके पास नहीं है। कोर्ट के आदेश पर ही पुराना बिसरा नष्ट किया जा सकता है। बताया कि उन्होंने एक माह पहले इस बाबत जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखा था, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया। बताया कि शासन की नई व्यवस्था के तहत अब पोस्टमार्टम हाउस में बिसरा नहीं रखा जाएगा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ ही बिसरा संबधित थाना भेज दिया जाएगा। कहा इससे बिसरा परीक्षण में पुलिस को लेटलतीफी नहीं उठाना पडे़गा। इस पर जल्द अमल होने के आसार हैं।

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.