भारत छोड़ो आंदोलन का केन्द्र बिन्दु शहर के चौक स्थित हजारी लाल का फाटक था

1857 से शुरू हुई आजादी की जंग के अंतिम मुकाम 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का केन्द्र बिन्दु शहर के चौक स्थित हजारी लाल का फाटक था। बलिया के कर्नल भगवान सिंह ने जिले के आठ सौ से अधिक देशभक्तों की फौज की कमान संभाली थी। झंडा गीत के रचयिता श्याम लाल गुप्त पार्षद ने आजादी की इस चिंगारी को तेज करने का प्रयास किया। शिवराजपुर का जंगल क्रांतिकारियों की शरण स्थली था। बताते हैं कि यहीं पर गुप्त रणनीति तय होती थी और फिर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने के लिये क्रांतिकारियों के दल निकल पड़ते थे।

नौ अगस्त उन्नीस सौ बयालीस को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जिले की महती भूमिका होने पर

1942 की लड़ाई में पूर्वाचल के जनपदों सहित बांदा व हमीरपुर के क्रांतिकारियों ने जिले को ही रणभूमि के रूप में स्वीकारा तभी तो बलिया के कर्नल भगवान सिंह, चीतू पांडेय जैसे क्रांतिकारी यहां के देशभक्तों का साथ देकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को तेज किया। जिले के क्रांतिकारी गुरुप्रसाद पांडेय, बंशगोपाल, शिवदयाल उपाध्याय, दादा दीप नारायण, शिवराज बली, देवीदयाल, रघुनंदन पांडेय, यदुनंदन प्रसाद, वासुदेव दीक्षित भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व कर जिले में एक माहौल पैदा कर दिया तभी तो एक-एक करके लगभग आठ सौ से अधिक की फौज क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों की सत्ता को हिला दिया। चौक स्थित हजारीलाल का फाटक क्रांतिकारियों के लिये गुप्तगू का मुख्य केन्द्र था। बताते हैं कि यहीं पर कानपुर व पूर्वाचल के क्रांतिकारी नेता आकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिये क्या करना है इसकी रणनीति बताते थे।

अंग्रेजी शासकों को हजारी लाल फाटक की जानकारी हो गयी थी। कई बार यहां छापा मारकर क्रांतिकारियों को दबोचने के प्रयास किये गये। आखिर क्रांतिकारियों को गुप्त स्थान खोजना ही पड़ा। शिवराजपुर के जंगल में क्रांतिकारियों का मजमा लगता था। बताते हैं कि अस्सी हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में विस्तारित जंगल को ही क्रांतिकारियों ने अपना ठिकाना बनाया। भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत गोपालगंज के फसिहाबाद स्थल से की गयी। इसके अलावा खागा जीटी रोड को भी केन्द्र बिन्दु बनाया गया। जहानाबाद, हथगाम, खागा सहित दो दर्जन से अधिकस्थानों पर क्रांतिकारियों ने धरना-प्रदर्शन कर अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये ललकारा। इस दरम्यान लगभग चार सौ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। नेतृत्व करने वाले आधे से अधिक नेता जब जेल चले गये तो अंगनू पांडेय, बद्री जैसे क्रांतिकारियों ने मोर्चा संभाला।

(साभार – दैनिक जागरण)



भारत छोड़ो आंदोलन का केन्द्र बिन्दु शहर के चौक स्थित हजारी लाल का फाटक था

1857 से शुरू हुई आजादी की जंग के अंतिम मुकाम 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का केन्द्र बिन्दु शहर के चौक स्थित हजारी लाल का फाटक था। बलिया के कर्नल भगवान सिंह ने जिले के आठ सौ से अधिक देशभक्तों की फौज की कमान संभाली थी। झंडा गीत के रचयिता श्याम लाल गुप्त पार्षद ने आजादी की इस चिंगारी को तेज करने का प्रयास किया। शिवराजपुर का जंगल क्रांतिकारियों की शरण स्थली था। बताते हैं कि यहीं पर गुप्त रणनीति तय होती थी और फिर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने के लिये क्रांतिकारियों के दल निकल पड़ते थे।

नौ अगस्त उन्नीस सौ बयालीस को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जिले की महती भूमिका होने पर

1942 की लड़ाई में पूर्वाचल के जनपदों सहित बांदा व हमीरपुर के क्रांतिकारियों ने जिले को ही रणभूमि के रूप में स्वीकारा तभी तो बलिया के कर्नल भगवान सिंह, चीतू पांडेय जैसे क्रांतिकारी यहां के देशभक्तों का साथ देकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को तेज किया। जिले के क्रांतिकारी गुरुप्रसाद पांडेय, बंशगोपाल, शिवदयाल उपाध्याय, दादा दीप नारायण, शिवराज बली, देवीदयाल, रघुनंदन पांडेय, यदुनंदन प्रसाद, वासुदेव दीक्षित भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व कर जिले में एक माहौल पैदा कर दिया तभी तो एक-एक करके लगभग आठ सौ से अधिक की फौज क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों की सत्ता को हिला दिया। चौक स्थित हजारीलाल का फाटक क्रांतिकारियों के लिये गुप्तगू का मुख्य केन्द्र था। बताते हैं कि यहीं पर कानपुर व पूर्वाचल के क्रांतिकारी नेता आकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिये क्या करना है इसकी रणनीति बताते थे।

अंग्रेजी शासकों को हजारी लाल फाटक की जानकारी हो गयी थी। कई बार यहां छापा मारकर क्रांतिकारियों को दबोचने के प्रयास किये गये। आखिर क्रांतिकारियों को गुप्त स्थान खोजना ही पड़ा। शिवराजपुर के जंगल में क्रांतिकारियों का मजमा लगता था। बताते हैं कि अस्सी हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में विस्तारित जंगल को ही क्रांतिकारियों ने अपना ठिकाना बनाया। भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत गोपालगंज के फसिहाबाद स्थल से की गयी। इसके अलावा खागा जीटी रोड को भी केन्द्र बिन्दु बनाया गया। जहानाबाद, हथगाम, खागा सहित दो दर्जन से अधिकस्थानों पर क्रांतिकारियों ने धरना-प्रदर्शन कर अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये ललकारा। इस दरम्यान लगभग चार सौ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। नेतृत्व करने वाले आधे से अधिक नेता जब जेल चले गये तो अंगनू पांडेय, बद्री जैसे क्रांतिकारियों ने मोर्चा संभाला।

(साभार – दैनिक जागरण)



जब गाँधी जी हुए फतेहपुर से नाराज….

चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी ने यह भावाव्यक्ति ऐसे युग पुरुष के लिये की थी जो अहिंसा के बल पर देश को आजादी दिलायी। जब हम राष्ट्रपिता बापू की जयंती मना रहे हैं ऐसे में उन दृश्यों को याद करना जरूरी है जब वह हमारे और आपके बीच आये और कुछ ऐसी प्रेरणा दी जिससे स्वदेशी की भावना बलवती हुई और विदेशी वस्तुओं की होलियां जलने लगीं।

साबरमती के संत की अगुवाई में जब समूचा देश दासता से मुक्त होने के लिये लड़ाई लड़ रहा था उस समय उनकी झलक पाने को हर कोई लालायित था। वाक्या वर्ष 1920 का है। महात्मा गांधी ट्रेन द्वारा कानपुर से इलाहाबाद जा रहे थे। क्रांतिकारियों को जब सूचना मिली कि बापू जनपद से गुजर रहे हैं। फतेहपुर रेलवे स्टेशन में बाबू बंशगोपाल, शिवदयाल उपाध्याय, गुरुप्रसाद पांडेय, पन्नालाल गुप्त, शिवदत्त तिवारी, यदुनंदन, रघुनंदन पांडेय, देवीदयाल अग्निहोत्री सहित बड़ी तादात में लोग बापू से मिलने पहुंच गये। गाड़ी आते ही भीड़ ने महात्मा गांधी जिन्दाबाद के नारे लगाये। बापू बोगी से बाहर नहीं निकले। अपने साथी लियाकत अली को भेजकर क्रांतिकारियों से पुंछवाया की विदेशी कपड़ों की होली जलायी गयी है या नहीं। का जवाब मिलने पर उन्होंने कहा कि पहले विदेशी कपड़ों की होली जलायें इसके बाद मैं फतेहपुर आऊंगा। क्रांतिकारियों ने मिलने की अनुनय-विनय की, लेकिन वह नहीं उतरे। कुछ क्रांतिकारी तो बिना टिकट ट्रेन में बैठकर इलाहाबाद चले गये।

महात्मा गांधी दोबारा वर्ष 1929 में पत्‍‌नी कस्तूरबा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खां लियाकत अली के साथ जनपद आये। पूरा एक दिन के समय में वह फतेहपुर, बिन्दकी सहित चौडगरा स्थित फसीहाबाग स्थल पर पहुंचे और कई जगह जनसभाओं को भी संबोधित किया। बिन्दकी के रामलीला मैदान में जिस समय तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता का विगुल फूंका, क्रांतिकारी ही नहीं आम जनमानस के अंदर आजादी का जुनून सिर चढ़कर बोलने लगा। वर्ष 1929 में बापू गोपालगंज स्थित फसीहाबाग पहुंचकर अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इसके बाद यहां से पैदल बिन्दकी के रामलीला मैदान में पहुंचे। यहां पर जनसभा को संबोधित किया। फतेहपुर शहर के हजारी लाल फाटक में गांधी जी ने जनसभा करके आजादी का विगुल फूंका
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(साभार : जागरण-याहू-इंडिया )

जब गाँधी जी हुए फतेहपुर से नाराज….

चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी ने यह भावाव्यक्ति ऐसे युग पुरुष के लिये की थी जो अहिंसा के बल पर देश को आजादी दिलायी। जब हम राष्ट्रपिता बापू की जयंती मना रहे हैं ऐसे में उन दृश्यों को याद करना जरूरी है जब वह हमारे और आपके बीच आये और कुछ ऐसी प्रेरणा दी जिससे स्वदेशी की भावना बलवती हुई और विदेशी वस्तुओं की होलियां जलने लगीं।

साबरमती के संत की अगुवाई में जब समूचा देश दासता से मुक्त होने के लिये लड़ाई लड़ रहा था उस समय उनकी झलक पाने को हर कोई लालायित था। वाक्या वर्ष 1920 का है। महात्मा गांधी ट्रेन द्वारा कानपुर से इलाहाबाद जा रहे थे। क्रांतिकारियों को जब सूचना मिली कि बापू जनपद से गुजर रहे हैं। फतेहपुर रेलवे स्टेशन में बाबू बंशगोपाल, शिवदयाल उपाध्याय, गुरुप्रसाद पांडेय, पन्नालाल गुप्त, शिवदत्त तिवारी, यदुनंदन, रघुनंदन पांडेय, देवीदयाल अग्निहोत्री सहित बड़ी तादात में लोग बापू से मिलने पहुंच गये। गाड़ी आते ही भीड़ ने महात्मा गांधी जिन्दाबाद के नारे लगाये। बापू बोगी से बाहर नहीं निकले। अपने साथी लियाकत अली को भेजकर क्रांतिकारियों से पुंछवाया की विदेशी कपड़ों की होली जलायी गयी है या नहीं। का जवाब मिलने पर उन्होंने कहा कि पहले विदेशी कपड़ों की होली जलायें इसके बाद मैं फतेहपुर आऊंगा। क्रांतिकारियों ने मिलने की अनुनय-विनय की, लेकिन वह नहीं उतरे। कुछ क्रांतिकारी तो बिना टिकट ट्रेन में बैठकर इलाहाबाद चले गये।

महात्मा गांधी दोबारा वर्ष 1929 में पत्‍‌नी कस्तूरबा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खां लियाकत अली के साथ जनपद आये। पूरा एक दिन के समय में वह फतेहपुर, बिन्दकी सहित चौडगरा स्थित फसीहाबाग स्थल पर पहुंचे और कई जगह जनसभाओं को भी संबोधित किया। बिन्दकी के रामलीला मैदान में जिस समय तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता का विगुल फूंका, क्रांतिकारी ही नहीं आम जनमानस के अंदर आजादी का जुनून सिर चढ़कर बोलने लगा। वर्ष 1929 में बापू गोपालगंज स्थित फसीहाबाग पहुंचकर अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इसके बाद यहां से पैदल बिन्दकी के रामलीला मैदान में पहुंचे। यहां पर जनसभा को संबोधित किया। फतेहपुर शहर के हजारी लाल फाटक में गांधी जी ने जनसभा करके आजादी का विगुल फूंका
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(साभार : जागरण-याहू-इंडिया )

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