>कबूतर – सोहन लाल द्विवेदी

>भोले-भाले बहुत कबूतर
मैंने पाले बहुत कबूतर
ढंग ढंग के बहुत कबूतर
रंग रंग के बहुत कबूतर
कुछ उजले कुछ लाल कबूतर
चलते छम छम चाल कबूतर
कुछ नीले बैंजनी कबूतर
पहने हैं पैंजनी कबूतर
करते मुझको प्यार कबूतर
करते बड़ा दुलार कबूतर
आ उंगली पर झूम कबूतर
लेते हैं मुंह चूम कबूतर
रखते रेशम बाल कबूतर
चलते रुनझुन चाल कबूतर
गुटर गुटर गूँ बोल कबूतर
देते मिश्री घोल कबूतर।

>बढे़ चलो, बढे़ चलो – सोहनलाल द्विवेदी

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न हाथ एक अस्त्र हो,

न अन्न वीर वस्त्र हो,

हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

रहे समक्ष हिम-शिखर,

तुम्हारा प्रण उठे निखर,

भले ही जाए जन बिखर,

रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

घटा घिरी अटूट हो,

अधर में कालकूट हो,

वही सुधा का घूंट हो,

जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

गगन उगलता आग हो,

छिड़ा मरण का राग हो,

लहू का अपने फाग हो,

अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

चलो नई मिसाल हो,

जलो नई मिसाल हो,

बढो़ नया कमाल हो,

झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

अशेष रक्त तोल दो,

स्वतंत्रता का मोल दो,

कड़ी युगों की खोल दो,

डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

>सोहन लाल द्विवेदी : एक परिचय

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राष्ट्रकवि पण्डित सोहन लाल द्विवेदी का का जन्म फतेहपुर जिले में बिन्दकी में सौ साल पहले उनका जन्म 22 फरवरी 1906 को हुआ था। सोहनलाल जी के साथ जुड़ा राष्टकवि का अलंकरण सरकारी कृपा ही नहीं बल्कि फनकी लोक स्वीकृति का प्रमाण है।

मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी या सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय नवजागरण के उत्प्रेरक ऐसे कवियों के नाम हैं, जिन्होंने अपने संकल्प और चिन्तन, त्याग और बलिदान के सहारे राष्ट्रीयता की अलख जगाकर, अपने पूरे युग को आन्दोलित किया था, गाँधी जी के पीछे देश की तरूणाई को खडा कर दिया था। सोहनलालजी उस श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी थे। डा. हरिवंशराय ‘बच्चन’ ने एक बार लिखा था ‘ जहाँ तक मेरी स्मृति है, जिस कवि को राष्ट्रकवि के नाम से सर्वप्रथम अभिहित किया गया, वे सोहनलाल द्विवेदी थे। गाँधीजी पर केन्द्रित उनका गीत युगावतार या उनकी चर्चित कृति ‘ भैरवी ‘ की पंक्ति वन्दना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो, हो जहाँ बलि शीश अगणित एक सिर मेरा मिला लो ‘ में कैद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सबसे अधिक प्रेरणा गीत था।

पूर्ण समन्वित

पंडित सोहनलालजी, महत्मा गाँधी के अहिंसा दर्शन के लिए पूर्ण समर्पित थे, और हिन्दी राष्ट्रीयता का स्वाभिमान, खादी का सम्मान और देश के नन्हें नौनिहालों के लिए अटूट आशीर्वाद उनके जीवन का लक्ष्य बन गया था, उन्होंने अपने साहित्य सेवा को राजनीतिक लाभ, सम्मान या व्यवसाय कभी बनने नहीं दिया इसी लिए उनके कवि मानस को पूर्वाग्रहहीन और जनोन्मुखी माना गया है। 2 अक्टूबर 1944 को, उन्होंने महत्मा गाँधी को उनके 77वें जन्मदिवस पर स्वयं सम्पादित गाँधी अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया था, जिसमें भारतीय भाषाओं में गाँधी पर लिखी गई सुन्दर रचनाओं का संकलन था,इस ग्रन्थ की भूमिका डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखी थी गाँधी पर वह पहला अभिनन्दन ग्रन्थ था। गाँधी जी ने 12 मार्च 1930को अपने 76 सत्याग्रही कार्य कर्त्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से 200 मील दूर दांडी मार्च किया था। भारत में पद यात्रा, जनसंपर्क और जनजागरण की ऋषि परम्परा मानी जाती है। आज उस परिघटना की 45 वीं जयन्ती देश में बडे.गौरव से मनाई जा रही है। उस यात्रा पर अंग्रेजी सत्ता को ललकारते हुए सोहनलाल जी ने कहा था -”या तो भारत होगा स्वतंत्र, कुछ दिवस रात के प्रहरों पर या शव बनकर लहरेगा शरीर, मेरा समुद्र की लहरों पर, हे शहीद, उठने दे अपना फूलों भरा जनाजा आज दांडी मार्च के उत्सव में सोहनलालजी का जिक्र कहीं है ?

पंडित बैजनाथ द्विवेदी उर्फ डा0 हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सोहनलालजी के सहपाठी और मित्र थे। उन्होंने अपने मित्र पर एक लेख लिखा था।

विश्वविद्यालय के विद्यार्थी समाज में उनकी कविताओं का बडा गहरा प्रभाव पडता था। उन्हें गुरूकुल महामना मदनमोहन मालवीय का आशीर्वाद प्राप्त था। अपने साथ स्वतंत्रता संग्राम में जूझने के लिए नवयुवकों की टोली बनाने में वे सदा सफल रहे भाई सोहनलालजी ने ठोंकपीट कर मुझे भी कवि बनाने की कोशिश की थी, छात्र कवियों की संस्था ‘ सुकवि समाज ‘के वे मंत्री थे और मै संयुक्त मंत्री, बहुत जल्दी ही मुझे मालूम हो गया कि यह क्षेत्र मेरा नहीं है, फिर भी उनके प्रेरणादायक पत्र मिलते रहते थे। यह बात शायद वे भी नहीं जानते थे कि हिन्दी साहित्य की भूमिका ‘मैने उन्हीं के उत्साहप्रद पत्रों के कारण लिखी थी।

उस दौर की राष्ट्रीयता चेतना प्रधान रचनाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोहनलालजी के खाते में है, सन् 1941 में देश प्रेम से लबरेज भैरवी, उनकी प्रथम प्रकाशित रचना थी। उनकी महत्वपूर्ण शैली में पूजागीत, युगाधार, विषपान, वासन्ती, चित्रा जैसी अनेक काव्यकृतियाँ सामने आई थी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा तो उसी समय सामने आई थी जब 1937 में लखनऊ से उन्होंने दैनिक पत्र अधिकार का सम्पादन शूरू किया था। चार वर्ष बाद उन्होंने अवैतनिक सम्पादक के रूप में ” बालसखा” का सम्पादन भी किया था देश में बाल साहित्य के वे महान आचार्य थे। उनके सहज और बाल सुलभ ह्वदय को, उनकी मृत्यु 1 मार्च 1988 तक, जिन्होंने देखा था, उनकी संख्या अंगणित है। शिशुभारती, बच्चोंके बापू , बिगुल , बाँसुरी , और झरना, दूध बतासा, और दर्जनों रचनाएँ भी बच्चों को आकर्षित करती हैं। 1969 में भारत सरकार ने आपको पद्दश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था।

सोहनलाल द्विवेदी की अविस्मरणीय रचना
युगावतार गांधी

चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, पड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गये उसी पर कोटि माथ।

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि! हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख, युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख;
तुम अचल मेखला बन भू की, खींचते काल पर अमिट रेख।

तुम बोल उठे, युग बोल उठा, तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर, युग कर्म जगा, युगधर्म तना।
युग-परिवर्त्तक, युग-संस्थापक, युग संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें, युग-युग तक युग का नमस्कार!

तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़, रचते रहते नित नई सृष्टि
उठती नवजीवन की नीवें, ले नवचेतन की दिव्य दृष्टि।
धर्माडंबर के खंडहर पर, कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर, निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!

बढ़ते ही जाते दिग्विजयी, गढ़ते तुम अपना रामराज
आत्माहुति के मणिमाणिक से, मढ़ते जननी का स्वर्ण ताज!
तुम कालचक्र के रक्त सने, दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़
मानव को दानव के मुँह से, ला रहे खींच बाहर बढ़-बढ़।

पिसती कराहती जगती के, प्राणों में भरते अभय दान
अधमरे देखते हैं तुमको, किसने आकर यह किया त्राण?
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से, तुम कालचक्र की चाल रोक
नित महाकाल की छाती पर लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!

कँपता असत्य, कँपती मिथ्या, बर्बरता कँपती है थर-थर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट, कँपते खिसके आते भू पर!
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है, उड़ता है तेरा ध्वज निशान!

हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खंडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र

साभार
अच्युतानंद मिश्र
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय
भोपाल, मध्यप्रदेश

Great personalities of fatehpur

Deputy Collector Hiqmat Ullah Khan : He was deputed in this district during 1857 revolution . He was very much impressed with the feelings of freedom fighters. Ultimately, he offered his services to the motherland and was included in the army of Nana Saheb Peshawa . In the same year, during a clash he was captured by the british army and was hanged on an Imali tree .

Rashtrakavi Sohan Lal Dwivedi : The great poet, who was awarded the title of “Rashtrakavi” . He was born in 1905 in Bindki sub-division of this district .

Shri Dariyaw Singh : He was one of those martyrs of this district, who sacrificed their everything in the war of freedom . He along with his son Sujan Singh and others, captured the Khaga sub-division of the district on June 8th, 1857 . Till July 11th, the district was under control of revolutionists . On March 6th, 1858, both of them along with others were sentenced to death by the british govt. .

Shri Ganesh Shankar Vidarthi : Renowned personality, freedom fighter influenced by Gandhi ideology, was born in the Hathgam place of this district . This place is a block headquarter .

Thakur Jodha Singh Ataiya : The resident of village Rasoolpur of this district, this freedom fighter played important role in 1857 revolution . On 28th April, 1858, he was hanged on the “Imali” tree near town Khajuha, with 51 other revolutionists . The tree still exists, and this place is known as “Bawani Imali” .

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